Mar 20, 2026

आगरा के किले का यात्रा-वृत्तांत

 

भारत की ऐतिहासिक धरोहरों में आगरा का किला एक ऐसा नाम है, जो केवल ईंट-पत्थरों से बनी भव्य इमारत नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, कला, स्थापत्य, राजनीति और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है। जब भी मुगलकालीन स्थापत्य की चर्चा होती है, ताजमहल के साथ-साथ आगरा के किले का उल्लेख अवश्य होता है। यह किला अपने भीतर अनेक कहानियाँ, अनेक स्मृतियाँ और अनेक राजवंशों की पदचाप समेटे हुए है। इसकी लाल बलुआ पत्थरों से बनी विशाल प्राचीरें, राजमहल, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, मस्जिदें, उद्यान, गुप्त मार्ग, बुर्ज और गलियारों में भारत के गौरवशाली अतीत की गूँज सुनाई देती है।

मेरे लिए आगरा के किले की यात्रा केवल एक पर्यटन यात्रा नहीं थी, बल्कि इतिहास से प्रत्यक्ष संवाद करने जैसा अनुभव थी। पुस्तकों में पढ़े गए मुगल सम्राटों के प्रसंग, अकबर की प्रशासनिक दक्षता, जहाँगीर का सौंदर्यबोध, शाहजहाँ की कलात्मक संवेदना और औरंगज़ेब के कठोर राजनीतिक निर्णय—सब कुछ मानो इस किले की दीवारों में सजीव हो उठा था। जब मैंने इस किले की यात्रा का निश्चय किया, तभी से मन में उत्सुकता भर गई थी कि आखिर वह स्थान कैसा होगा, जहाँ कभी सम्राट रहते थे, जहाँ से साम्राज्य संचालित होता था, और जहाँ इतिहास ने कई निर्णायक मोड़ लिए।

यह यात्रा-वृत्तांत उसी अविस्मरणीय अनुभव का विस्तार है—जिसमें यात्रा की तैयारी से लेकर किले के दर्शन, उसकी स्थापत्य विशेषताओं, ऐतिहासिक स्मृतियों, वहाँ के वातावरण, स्थानीय जनजीवन और मेरे मन पर पड़े प्रभाव—सबका विस्तृत वर्णन किया गया है।

यात्रा की योजना

आगरा की यात्रा का विचार अचानक नहीं आया था। बहुत दिनों से इच्छा थी कि ताजमहल के साथ-साथ आगरा के किले को भी निकट से देखा जाए। अक्सर पर्यटक ताजमहल पर अधिक ध्यान देते हैं, परंतु इतिहास की दृष्टि से आगरा का किला उतना ही महत्वपूर्ण है। एक दिन मैंने निश्चय किया कि इस बार केवल भ्रमण नहीं, बल्कि समझने और महसूस करने के उद्देश्य से आगरा जाया जाए।

यात्रा की तैयारी करते समय मैंने आगरा के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों की जानकारी एकत्र की। आगरा का किला यमुना नदी के तट पर स्थित है और इसका निर्माण मुख्य रूप से मुगल सम्राट अकबर ने 16वीं शताब्दी में कराया था। बाद में जहाँगीर और शाहजहाँ ने इसमें कई सुंदर भवनों और संरचनाओं का निर्माण करवाया। मैंने यह भी जाना कि यह किला यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है, जिससे इसकी वैश्विक महत्ता का अनुमान लगाया जा सकता है।

यात्रा के लिए मैंने प्रातःकाल का समय चुना, क्योंकि ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण सुबह के शांत वातावरण में अधिक आनंददायक होता है। साथ में एक डायरी, कलम, पानी की बोतल, कैमरा और कुछ आवश्यक वस्तुएँ रखीं। मन में उत्साह था, मानो किसी सामान्य नगर की नहीं, बल्कि इतिहास की राजधानी की यात्रा पर जा रहा हूँ।

आगरा की ओर प्रस्थान

निर्धारित दिन प्रातः मैं अपने नगर से आगरा के लिए रवाना हुआ। रेल यात्रा का अपना ही आनंद होता है। खिड़की के पास बैठकर बाहर बदलते दृश्य, खेत, गाँव, छोटे-छोटे स्टेशन, दूर तक फैले वृक्ष और कहीं-कहीं नदियों के दर्शन होते रहे। यात्रा के दौरान मन बार-बार उसी किले की कल्पना कर रहा था—कैसी होंगी उसकी प्राचीरें? कितना विशाल होगा उसका प्रांगण? क्या वहाँ पहुँचकर सचमुच इतिहास की अनुभूति होगी?

जैसे-जैसे आगरा निकट आता गया, मन का कौतूहल बढ़ता गया। आगरा पहुँचकर शहर की पहली झलक ने ही यह आभास करा दिया कि यह नगर केवल एक आधुनिक शहर नहीं, बल्कि अपने भीतर इतिहास की गहरी परतें समेटे हुए है। सड़कें, बाजार, पर्यटकों की चहल-पहल, स्थानीय लोगों की आवाजाही—सबमें एक विशिष्ट जीवंतता थी। दूर कहीं लाल रंग की विशाल संरचना की झलक दिखी, तो लगा कि शायद वही आगरा का किला है, जिसकी प्रतीक्षा मैं पूरे मार्ग में करता आया था।

आगरा नगर का प्रथम अनुभव

आगरा शहर में प्रवेश करते ही ऐसा लगा मानो वर्तमान और अतीत साथ-साथ चल रहे हों। एक ओर आधुनिक यातायात, होटल, दुकानें और बाजार थे, तो दूसरी ओर ऐतिहासिक स्मारकों की ओर संकेत करते बोर्ड, पर्यटकों के समूह और पुराने समय की गंध लिए गलियाँ। शहर में ताजमहल, आगरा किला, इतमाद-उद-दौला और फतेहपुर सीकरी जैसे स्थलों की चर्चा हर जगह सुनाई पड़ रही थी।

स्थानीय लोगों के व्यवहार में अपनापन था। एक रिक्शा चालक से बातचीत के दौरान उसने बड़े गर्व से कहा—“साहब, आगरा केवल ताजमहल नहीं है, आगरा का किला भी कम नहीं।” उसकी यह बात मेरे मन में बस गई। सच ही तो है—कई बार किसी एक प्रसिद्ध स्मारक की चमक में दूसरे स्मारकों की महत्ता कुछ कम आँकी जाने लगती है, जबकि वे अपने आप में उतने ही असाधारण होते हैं।

किले के प्रवेश द्वार पर

कुछ ही समय में मैं आगरा के किले के प्रवेश द्वार पर पहुँच गया। सामने जो दृश्य था, उसे देखकर मैं कुछ क्षणों के लिए ठिठक गया। विशाल लाल दीवारें, ऊँची-ऊँची प्राचीरें, मजबूत दुर्गनुमा संरचना और चारों ओर फैला हुआ भव्य परिसर—सब कुछ अत्यंत प्रभावशाली था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कोई मौन प्रहरी सदियों से अडिग खड़ा हो और समय के अनगिनत थपेड़ों को सहते हुए भी अपने गौरव को सुरक्षित रखे हुए हो।

प्रवेश द्वार की स्थापत्य संरचना को देखकर स्पष्ट था कि यह केवल सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाया गया था। द्वार के आसपास की बनावट, मार्ग का घुमाव और दीवारों की मजबूती से इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि यह किला युद्ध और आक्रमणों से रक्षा के लिए भी अत्यंत सुदृढ़ था।

टिकट लेकर जब मैं भीतर प्रवेश करने लगा, तब मन में एक अद्भुत भाव था—जैसे किसी पुस्तक का पृष्ठ पलटकर मैं सीधे उसके भीतर प्रवेश कर रहा हूँ।

किले का प्रथम दर्शन

भीतर प्रवेश करते ही विशालता का एहसास और गहरा हो गया। किले का आंतरिक परिसर अत्यंत विस्तृत है। लाल पत्थरों की भव्यता और भवनों की कलात्मकता एक साथ दिखाई देती है। यह केवल एक सैनिक दुर्ग नहीं, बल्कि राजप्रासादों, प्रशासनिक भवनों, उद्यानों और धार्मिक स्थलों का समन्वित परिसर है। यहीं इसकी विशिष्टता है।

चारों ओर पर्यटक थे, परंतु किले का आकार इतना विशाल है कि भीड़ भी उसके वैभव को कम नहीं कर पाती। चलते-चलते मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं किसी संग्रहालय में नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवित इतिहास में प्रवेश कर चुका हूँ, जहाँ हर प्रांगण का अपना चरित्र है, हर भवन की अपनी स्मृति है और हर दीवार की अपनी भाषा है।

आगरा के किले का ऐतिहासिक महत्व

आगरा का किला भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यद्यपि इस स्थान पर पहले भी एक दुर्गनुमा संरचना विद्यमान थी, परंतु इसका वर्तमान रूप मुगल सम्राट अकबर ने 1565 ई. के आसपास निर्मित कराया। अकबर ने इसे अपने साम्राज्य की प्रमुख राजधानी के रूप में विकसित किया। बाद में जहाँगीर और शाहजहाँ ने इसे और अधिक सुंदर एवं कलात्मक बनाया।

यही वह स्थान है, जहाँ से मुगल शासन के अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। यही किला सम्राटों का निवास भी रहा और सत्ता का केंद्र भी। शाहजहाँ के जीवन का अंतिम चरण भी इसी किले से जुड़ा है। कहा जाता है कि औरंगज़ेब ने शाहजहाँ को इसी किले में नज़रबंद कर दिया था, जहाँ से वे यमुना के पार ताजमहल को निहारा करते थे। यह कथा आज भी आगंतुकों के मन को गहराई से छूती है।

इतिहास की दृष्टि से यह किला केवल एक राजमहल नहीं, बल्कि सत्ता, वैभव, संघर्ष, प्रेम, विरह और पतन—सबका साक्षी है। यही कारण है कि इसका भ्रमण करते समय केवल स्थापत्य नहीं, बल्कि समय की एक दीर्घ धारा भी हमारे सामने खुलती जाती है।

लाल पत्थरों की भव्यता

आगरा के किले की सबसे पहली और सबसे प्रभावशाली विशेषता है—उसका लाल बलुआ पत्थर। दूर से देखने पर यह किला लाल आभा में दमकता प्रतीत होता है। सूर्य की किरणें जब इन दीवारों पर पड़ती हैं, तो इनका रंग और भी आकर्षक हो जाता है। ऐसा लगता है कि पत्थर निर्जीव नहीं, बल्कि अपने भीतर गर्म रक्त-सा इतिहास संजोए हुए हैं।

इन पत्थरों की सतह पर कहीं साधारण सादगी है, तो कहीं नक्काशी और कलात्मकता का अद्भुत संगम। यह लाल रंग मुगल स्थापत्य की शक्ति और गरिमा दोनों का प्रतीक प्रतीत होता है। बाद में शाहजहाँ ने जहाँ-तहाँ संगमरमर का भी प्रयोग करवाया, जिससे लाल पत्थर और श्वेत संगमरमर का सुंदर विरोधाभास दिखाई देता है। इस रंग-संयोजन में सौंदर्य और सत्ता दोनों की अभिव्यक्ति निहित है।

दीवान-ए-आम का दर्शन

किले के भीतर आगे बढ़ते हुए मैं दीवान-ए-आम पहुँचा। यह वह स्थान था जहाँ सम्राट जनता की समस्याएँ सुनता था और दरबार लगाता था। इस भवन को देखकर सहज ही यह कल्पना की जा सकती है कि यहाँ कितनी गंभीर और भव्य राजकीय सभाएँ होती होंगी। विशाल प्रांगण, स्तंभों की कतारें और खुला वातावरण इसे सार्वजनिक सभा के लिए उपयुक्त बनाते हैं।

मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा और मन ही मन उस समय की कल्पना करता रहा—चारों ओर दरबारी, सामने सम्राट का आसन, कहीं राजकीय अधिकारी, कहीं याचक, कहीं विदेशी दूत, कहीं सैन्य अधिकारी। दीवान-ए-आम केवल एक भवन नहीं, बल्कि शासन-व्यवस्था का प्रतीक था। यहाँ खड़े होकर अकबर के सुव्यवस्थित प्रशासन और जनता से संवाद की भावना का स्मरण स्वाभाविक रूप से हो आता है।

दीवान-ए-खास की गरिमा

दीवान-ए-आम से आगे बढ़कर जब दीवान-ए-खास पहुँचा, तो वहाँ का वातावरण भिन्न लगा। यह अपेक्षाकृत अधिक विशिष्ट और सुरुचिपूर्ण था। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह निजी अथवा विशेष दरबार के लिए प्रयोग किया जाता था। यहाँ सम्राट महत्वपूर्ण मंत्रियों, विदेशी प्रतिनिधियों तथा विशिष्ट अतिथियों से चर्चा करता था।

इस भवन की बनावट में शाही गरिमा स्पष्ट झलकती है। अलंकरण, स्तंभों की शैली और संपूर्ण संरचना में एक ऐसा संतुलन है, जिसमें राजसी भव्यता और कलात्मक सौंदर्य दोनों विद्यमान हैं। यहाँ पहुँचकर मन में यह अनुभूति हुई कि सत्ता केवल शौर्य से नहीं चलती, उसमें कूटनीति, विवेक, विचार-विमर्श और सांस्कृतिक परिष्कार का भी बड़ा महत्व होता है।

जहाँगीरी महल की कलात्मकता

आगरा के किले में जहाँगीरी महल ने मुझे विशेष रूप से आकर्षित किया। यद्यपि इसका नाम जहाँगीर से जुड़ा है, परंतु इसका निर्माण अकबर ने कराया था। यह महल मुगल स्थापत्य में हिंदू और इस्लामी शैलियों के समन्वय का सुंदर उदाहरण है। विशाल आँगन, सजीले मेहराब, छतरियाँ, झरोखे और अलंकरण इसकी सुंदरता को विशेष बना देते हैं।

जहाँगीरी महल में खड़े होकर लगा कि यह केवल निवास स्थान नहीं रहा होगा, बल्कि शाही जीवन की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का केंद्र भी रहा होगा। यहाँ की शिल्प-सज्जा में कोमलता है, भव्यता है और एक ऐसा सौंदर्यबोध है जो मन को तुरंत अपनी ओर खींच लेता है। यह महल इस बात का प्रमाण है कि मुगलकालीन स्थापत्य केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि उसमें कला के प्रति गहरी रुचि और संवेदनशीलता भी थी।

खास महल और शाहजहाँ का सौंदर्यबोध

शाहजहाँ को स्थापत्य कला का महान संरक्षक माना जाता है, और आगरा के किले में स्थित खास महल इसका सजीव प्रमाण है। यहाँ पहुँचते ही लाल पत्थरों की अपेक्षा श्वेत संगमरमर की शीतल सुंदरता अधिक महसूस होती है। संगमरमर की चिकनी सतह, बारीक नक्काशी, सुरुचिपूर्ण मेहराब और सुरुचिपूर्ण कक्षों की योजना देखकर स्पष्ट अनुभव होता है कि शाहजहाँ का झुकाव कोमल और परिष्कृत सौंदर्य की ओर था।

खास महल में खड़े होकर मुझे ताजमहल की स्मृति भी हो आई, क्योंकि संगमरमर के प्रति वही अनुराग यहाँ भी दिखाई देता है। यहाँ का वातावरण राजसी होते हुए भी अत्यधिक कोमल प्रतीत हुआ। ऐसा लगता है जैसे शक्ति और संवेदना का सुंदर मेल इस भवन में आकार ले उठा हो।

मुसम्मन बुर्ज और शाहजहाँ की स्मृति

आगरा के किले का सबसे भावुक स्थल मेरे लिए मुसम्मन बुर्ज रहा। यह वही अष्टकोणीय बुर्ज माना जाता है, जहाँ शाहजहाँ को जीवन के अंतिम दिनों में नज़रबंद रखा गया था। यमुना की ओर खुलती खिड़कियों और बालकनियों से दूर ताजमहल दिखाई देता है। उस क्षण की कल्पना भर से मन भीग उठता है—एक सम्राट, जिसने ताजमहल जैसी अनुपम रचना बनवाई, वही अंततः अपने ही पुत्र द्वारा बंदी बना दिया गया और दूर से अपनी प्रिय पत्नी की स्मृति में बने उस स्मारक को निहारता रह गया।

जब मैंने बुर्ज से बाहर देखा, तो लगा कि इतिहास केवल विजयों का नहीं होता; उसमें पीड़ा, विरह और अकेलापन भी उतना ही सत्य है। शाहजहाँ की कथा ने इस स्थान को केवल स्थापत्य की दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया है।

शीश महल का आकर्षण

किले के भीतर स्थित शीश महल भी अत्यंत रोचक स्थल है। यद्यपि आज उसके कुछ हिस्से ही सुरक्षित हैं, फिर भी उसकी कलात्मकता का अनुमान लगाया जा सकता है। दीवारों और छतों पर जड़े दर्पणों और सजावटी तत्वों की कल्पना ही उसके पूर्व वैभव का बोध करा देती है। प्रकाश जब इन सतहों पर पड़ता होगा, तब उसका प्रतिबिंब वातावरण को कितना मोहक बना देता होगा—यह सोचकर ही मन रोमांचित हो उठा।

शीश महल का निर्माण और उसका विन्यास इस बात का संकेत है कि शाही जीवन में आराम, मनोरंजन और सौंदर्य-विलास के लिए भी विशेष प्रबंध होते थे। यह महल मुगल शासकों की परिष्कृत जीवनशैली की झलक प्रस्तुत करता है।

मोती मस्जिद की शांति

आगरा के किले में स्थित मोती मस्जिद अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सुंदर और शांतिपूर्ण प्रतीत हुई। श्वेत संगमरमर से निर्मित यह मस्जिद अत्यधिक भव्य होने के साथ-साथ अत्यंत सौम्य भी है। इसकी पवित्रता और सादगी मन को सहज ही आकर्षित करती है। मस्जिद के भीतर का शांत वातावरण किले की राजनीतिक हलचल से बिल्कुल भिन्न अनुभूति कराता है।

यहाँ पहुँचकर महसूस हुआ कि राजसत्ता के केंद्र में भी आध्यात्मिक जीवन की अपनी जगह होती है। युद्ध, राजनीति, निर्णय और वैभव के बीच प्रार्थना और आत्मचिंतन के लिए ऐसे स्थानों का होना मुगल जीवन की बहुआयामी प्रकृति को प्रकट करता है।

उद्यान, गलियारे और वातावरण

किले में घूमते हुए केवल प्रमुख भवन ही नहीं, बल्कि उनके बीच के मार्ग, आँगन, गलियारे और खुले प्रांगण भी मन को आकर्षित करते हैं। कई स्थानों पर उद्यानों के अवशेष और उनकी संरचनाएँ दिखाई देती हैं। यद्यपि समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है, फिर भी यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि कभी यहाँ सजे-धजे बाग, फव्वारे और सुव्यवस्थित मार्ग रहे होंगे।

इन गलियारों से होकर चलते हुए ऐसा लगता है जैसे समय की सुरंगों से गुजर रहे हों। कहीं दूर पर्यटकों की हल्की आवाजें, कहीं पक्षियों का स्वर, कहीं हवा की सरसराहट—और बीच-बीच में इतिहास का गहरा मौन। यही मौन इस यात्रा का सबसे प्रभावशाली तत्व था।

स्थापत्य की विशेषताएँ

आगरा का किला भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी संरचना में सैन्य दृष्टि की दृढ़ता और राजप्रासादीय सौंदर्य का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। मोटी प्राचीरें, सुरक्षित द्वार, घुमावदार प्रवेश मार्ग, बुर्ज, खाइयाँ और ऊँचे सुरक्षा तंत्र इसे एक शक्तिशाली दुर्ग बनाते हैं। दूसरी ओर महलों की बारीक नक्काशी, मेहराब, जालियाँ, छतरियाँ, स्तंभ, संगमरमर, जल-व्यवस्था और अलंकरण इसे कलात्मक उत्कर्ष का प्रतीक भी बनाते हैं।

इस किले की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि यहाँ विभिन्न कालों की स्थापत्य शैलियों का विकास एक ही परिसर में दिखाई देता है। अकबर की शैली में जहाँ शक्ति, विस्तार और भारतीय तत्वों का समावेश है, वहीं शाहजहाँ की शैली में संगमरमर, कोमलता और शुद्ध सौंदर्य का प्रभुत्व है। इस प्रकार आगरा का किला स्थापत्य के क्रमिक विकास का भी एक महत्वपूर्ण अध्ययन-स्थल है।

किले में इतिहास की अनुभूति

किसी ऐतिहासिक स्थल की सबसे बड़ी शक्ति यह होती है कि वह हमें केवल जानकारी नहीं देता, बल्कि अनुभव भी कराता है। आगरा के किले में मुझे यही अनुभव हुआ। यहाँ चलते हुए लगा कि इतिहास केवल तिथियों और घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि मानवीय जीवन का विशाल प्रवाह है। यहाँ शक्ति भी थी, वैभव भी, षड्यंत्र भी, प्रेम भी, कला भी, युद्ध भी और विरह भी।

किले की दीवारें मौन हैं, परंतु उनका मौन भी बोलता है। वे बताती हैं कि समय कितना शक्तिशाली है—वही समय जो सम्राटों को महान बनाता है और वही समय जो उन्हें इतिहास की स्मृति में बदल देता है। इस किले में घूमते हुए मन में वैभव के प्रति आकर्षण के साथ-साथ जीवन की नश्वरता का बोध भी जागा।

पर्यटकों की उपस्थिति और सांस्कृतिक महत्त्व

आगरा का किला केवल भारतवासियों के लिए ही नहीं, बल्कि विश्वभर के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। वहाँ विभिन्न भाषाएँ बोलते, अलग-अलग देशों से आए लोगों को देखकर मुझे अच्छा लगा। इससे स्पष्ट है कि भारतीय इतिहास और संस्कृति की पहुँच विश्वव्यापी है। विदेशी पर्यटक बड़ी रुचि से गाइड की बातें सुन रहे थे, भवनों की तस्वीरें ले रहे थे और स्थापत्य की प्रशंसा कर रहे थे।

यह दृश्य देखकर मन में गर्व की भावना उत्पन्न हुई कि हमारे देश की सांस्कृतिक धरोहरें विश्व में सम्मानित हैं। साथ ही यह भी लगा कि ऐसे स्थलों का संरक्षण केवल सरकारी दायित्व नहीं, बल्कि हम सभी का कर्तव्य है।

स्थानीय मार्गदर्शक से बातचीत

किले के भीतर एक स्थानीय गाइड से मेरी बातचीत हुई। उसने बहुत रोचक ढंग से किले का इतिहास सुनाया। उसके शब्दों में केवल जानकारी नहीं, बल्कि अपनापन और गर्व भी था। उसने बताया कि आगरा का किला कभी मुगल साम्राज्य का वास्तविक शक्ति-केंद्र था। उसने दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, मुसम्मन बुर्ज और जहाँगीरी महल से जुड़ी कई बातें विस्तार से बताईं।

उसकी बातों से यह भी समझ में आया कि इतिहास को केवल किताबों से नहीं, बल्कि स्थानीय स्मृतियों और जनश्रुतियों से भी समझना चाहिए। कई बार किसी स्थान का वातावरण और वहाँ के लोगों की बातें उस इतिहास को अधिक जीवंत बना देती हैं।

यमुना तट का दृश्य

किले के कुछ भागों से यमुना नदी का दृश्य दिखाई देता है। आज यमुना का रूप भले ही अतीत की तुलना में परिवर्तित हो गया हो, फिर भी उसका किले से संबंध बहुत महत्वपूर्ण है। नदी के किनारे स्थित होने के कारण किले की रणनीतिक महत्ता भी बढ़ जाती थी। साथ ही शाही जीवन में नदी का सौंदर्यात्मक महत्त्व भी रहा होगा।

यमुना की ओर दृष्टि डालते हुए मुझे लगा कि कितने युगों से यह नदी इस किले की सखी बनी हुई है। इसने मुगल सम्राटों के वैभव को भी देखा, उनके संघर्षों को भी, और आज के पर्यटकों की चहल-पहल को भी। नदी और किला—दोनों मिलकर समय के प्रवाह का अद्भुत प्रतीक बन जाते हैं।

मन पर पड़ा प्रभाव

आगरा के किले की यात्रा ने मेरे मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। पहले मैं इसे केवल एक ऐतिहासिक स्मारक मानता था, परंतु वहाँ जाकर अनुभव हुआ कि यह भारतीय इतिहास की एक जीवित पाठशाला है। इस यात्रा ने मेरे भीतर इतिहास के प्रति रुचि को और अधिक प्रबल किया। साथ ही यह भी महसूस कराया कि स्थापत्य केवल निर्माणकला नहीं, बल्कि एक सभ्यता की आत्मा का रूपांतरण है।

किले में देखी गई भव्यता ने आश्चर्य से भर दिया, पर शाहजहाँ की स्मृति ने संवेदना भी जगाई। दीवान-ए-आम ने शासन की कल्पना कराई, दीवान-ए-खास ने कूटनीति की, मोती मस्जिद ने शांति की, और विशाल प्राचीरों ने सुरक्षा और शक्ति की। इस प्रकार एक ही यात्रा में अनेक अनुभूतियाँ प्राप्त हुईं।

धरोहर संरक्षण की आवश्यकता

इतनी अद्वितीय धरोहर को देखकर मन में यह विचार भी आया कि इसके संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। समय, प्रदूषण, भीड़, उपेक्षा और प्राकृतिक प्रभाव—ये सभी ऐतिहासिक स्मारकों के लिए चुनौती हैं। यदि हम अपनी धरोहरों को सहेजकर नहीं रखेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ अपने इतिहास को केवल पुस्तकों और चित्रों में ही देख पाएँगी।

ऐसे स्थलों पर स्वच्छता, अनुशासन और जागरूकता अत्यंत आवश्यक है। पर्यटकों को भी चाहिए कि वे स्मारकों की गरिमा बनाए रखें, दीवारों पर कुछ न लिखें, कूड़ा न फैलाएँ और इन स्थलों को सम्मान के साथ देखें। इतिहास हमारी सामूहिक संपत्ति है, और उसका संरक्षण हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।

वापसी की घड़ी

धीरे-धीरे सूर्य पश्चिम की ओर झुकने लगा। किले के लाल पत्थरों पर पड़ती सुनहरी रोशनी ने पूरे वातावरण को और भी मनोहारी बना दिया। मुझे लगा मानो किला दिनभर की कथा कहकर अब संध्या की चादर ओढ़ने जा रहा हो। लौटते समय मैंने एक बार फिर पीछे मुड़कर उस विशाल संरचना को देखा। मन में एक अजीब-सी तृप्ति थी, साथ ही हल्की-सी उदासी भी कि यह अद्भुत यात्रा समाप्त होने जा रही है।

वापसी के मार्ग में भी मेरा मन उसी किले में अटका रहा। आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य आ रहे थे—विशाल प्राचीरें, संगमरमर के महल, बुर्ज से दिखता ताजमहल, शांत मस्जिद, भव्य सभागार और इतिहास की गूँज। ऐसा लगा कि मैं आगरा के किले से केवल स्मृतियाँ लेकर नहीं लौट रहा, बल्कि अपने भीतर एक नया दृष्टिकोण भी लेकर लौट रहा हूँ।

आगरा के किले की यात्रा मेरे जीवन की अत्यंत प्रेरणादायक और ज्ञानवर्धक यात्राओं में से एक रही। इस यात्रा ने मुझे यह सिखाया कि इतिहास केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान को समझने और भविष्य को दिशा देने वाला दर्पण है। आगरा का किला शक्ति, कला, संस्कृति, प्रशासन, मानवीय संवेदना और समय की अनश्वरता—सबका अद्भुत संगम है।

यह किला हमें बताता है कि सभ्यताएँ केवल युद्धों से नहीं, बल्कि कला, स्थापत्य, विचार, संवाद और स्मृति से भी महान बनती हैं। इसकी प्राचीरों में साम्राज्य की शक्ति है, इसके महलों में सौंदर्य की कोमलता है, इसके गलियारों में इतिहास की पदचाप है और इसके वातावरण में भारतीय संस्कृति की गरिमा।

मेरे लिए यह यात्रा केवल एक स्मारक-दर्शन नहीं, बल्कि आत्मानुभूति का अवसर थी। आगरा का किला आज भी उतनी ही गरिमा से खड़ा है, मानो आने वाली पीढ़ियों को पुकारकर कह रहा हो—“आओ, मुझे देखो, मुझे समझो, क्योंकि मेरी दीवारों में तुम्हारे अतीत की आवाज़ बसती है।”

Jul 30, 2018


डिग्री कॉलेज कॉपियों का मूल्यांकन: कतिपय परीक्षकों के पौ-बारह


सर्वत्र विदित है कि डॉक्टरों को जैसे बरसात का बेकरारी से इंतजार रहता है, वैसे ही परीक्षाओं के बाद डिग्री कालेज के कतिपय सिद्धहस्थ प्रोफेसरों को कॉपियां जांचने का इंतजार रहता है। मैंने कही पढा था कि बिहार के कटैये पंजाब के फसल की बैसाखी लूटने को बेकरार रहते थे। लेकिन बुरा हो अत्याधुनिक मशीनों का, यह मजा ही किरकिरा कर दिया कि खलिहानों के रतजगे- लोकराग-रंग सब गायब ही हो गए।
ओएमआर के उपयोग के बाद, हालांकि कॉपियां जांचने का काम अभी उतना नीरस नहीं हुआ है क्योंकि फिर भी केंद्रीय मूल्यांकन में अभी रौनक है। धोती-लंगोटी संभाले कपियां गैंग के गिरोह, बिना आमन्त्रण पत्र धारक, परीक्षकों के झुंड, विश्वविद्यालय कैंपसों को जुगाड़ से ऐसे ढूंढ लेते हैं, जैसे मरे जानवरों को गिद्ध। उनमें भी संपातियों की नजर सीधे अशोक वाटिका पर रहती है अर्थात कोठार। कलयुग के अर्जुनों की आंखें कॉपियों के बंडलों पर ही रहती हैं। भूले हुए पहाड़े फिर रट ही जाते हैं। हर मंडी का भाव जुबानी याद है। मजदूरी वहां पहले, जहां रेट और कापियों की संख्या ज्यादा है। नंबर बढ़वाने का धंधा हालांकि बार कोडिंग की वजह से लगभग मृतप्राय है। लेकिन समझदार छात्र कॉपियों में सीधे दान-दक्षिणा अवश्य रख देंते हैं, यदि कोडिंग वालों की दृष्टि से बचा रह गया तो वह चढ़ावा ऊपर से है। कलयुग में विश्वविद्यालयी मूल्यांकन व्यवस्था में दत्तचित्त परीक्षक ही सच्चा योगी है। वह नित्य क्रियाओं में भी एक सेकंड बरबाद नहीं करना चाहता। पाबंदी न हो, तो दिन-भर में हजार दो हजार कॉपी जांच दें अर्थात नम्बरो का अंकन कर दें। यदि जुगाड़ फिट हो, तो हजार रात में भी , लेकिन ऐसा सौभाग्य शायद ही अब किसी को मिलता हो। हालांकि यह तो सामान्य परीक्षक की गति है। पुराने अनुभवी लोग बताते हैं कि सुपरसोनिक तो एक चावल से हांडी पहचान जाते हैं। कॉपी के भीतर जाने की जरूरत ही नहीं। बिना झंझट लिए सब ऊपर ही ऊपर क्लियर कर देते हैं।
कलयुग के ख्याति लब्ध चक्रवर्ती परीक्षको को सरस्वती का वरदहस्त प्राप्त है। वे हर जगह मौजूद हैं। दिन में कानपुर, तो रात में झांसी तो सुबह फिर आगरा या बरेली। जहां पूरे दिन में केवल पचास कॉपियां मिलती हों, उधर झांकना भी नहीं चाहते ऐसे दिग्गज। हालांकि कतिपय अयोग्य अर्थात व्यवस्था में न रमने वाले शिक्षक अगर मनोयोग से दिन में 25 या 50 उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन करते हैं तो कई विश्वविद्यालय उन्हें DA न देकर उनके इस प्रयास को अनावश्यक और अनुपयोगी सिद्ध कर ही देते हैं क्योंकि उन्हें जल्दी रिजल्ट लाना है। इस प्रकार सुपरसोनिक लोग ठेके पर सामूहिक कत्ल के शौकीन बन ही जाते हैं। एक मेरे मित्र का कहना है कि , कौन कहता है कि फांसी देने को जल्लाद नहीं मिलते, ये कतिपय परीक्षक तो पैदल ही दौड़-दौड़कर पूरे देश की मूल्यांकन व्यवस्था को फांसी दे दें। कतिपय विश्वविद्यालयी जुगाड़ू परीक्षक उड़ाका दल व ऑब्जर्वर के कार्य हेतु दत्तचित्त सुयोग्य एवं अति कर्मठ, इमानदार हैं वह अपनी ड्यूटी नकल रोकने के महान लक्ष्य को पूरा करने में सेल्फ फाइनेंस के प्रैक्टिकल/वायवा या पैनल आदि में लगवाते है ताकि व्यवस्थाओं को लिफाफा बनाकर सफल बना सकें, उनके लिए मूल्यांकन बेगारी सी है। कालेजो के 9000 ग्रेड पे धारक ज्यादातर प्रोफेसर व विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर इसे घृणित कर्म समझते हैं 30 प्रतिशत का इनकम टैक्स स्लैब उनके अरमानों पर पानी फेर देता है। इसलिए आप शोध ग्रंथ से नीचे का मूल्यांकन पसंद नहीं करते। कुछ को केवल केंद्रीय विश्वविद्यालयों के स्तर का ही पसंद है या फिर पियर टीम में मेम्बरी। इसमें हवाई सफर व vip लाभ होता है। फिर नियुक्तियों में भी कभी कभी कतिपय पौ-बारह हो ही जाती है।
अपने आसपास के विश्वविद्यालयों के मूल्यांकन केंद्रों पर निगाह रखें। वहा कपियां गैंग का आक्रमण कॉपियों पर हो रहा होगा, होने वाला होगा या हो चुका होगा और परीक्षक डोरी , डंगर लिए एक विश्वविद्यालय से दूसरे विश्वविद्यालय में कोटा पूरा करने के हर संभव प्रयास में लगे होंगे भला हो, प्राचार्य महोदयों का, जो उनके इस पुनीत कार्य हेतु झोली भर कृपा बनाये रखे अर्थात अधिकतम कार्यवकाश बिना बाधा बस प्रदान कर दें। ताकि इनका यह सीजन अच्छा हो जाय।
।।सहमति असहमति का स्वागत।। व्यक्तिगत निहितार्थ न ढूंढे।।

राजनेता लोग की कार्यक्षमता 60 के बढ़ जाती है कैसे?

मुझे आजतक ये समझ नही आया कि सरकारी कर्मचारी को 60 वर्ष में सिर्फ इसलिए रिटायर कर दिया जाता है कि वह अपने काम को बेहतर करने में कठिनाई फील करेगा कार्य की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है खुद सरकार 50 साल से अधिक के लोगो को स्वच्छिक सेवानिवृत्त कर रही है, लेकिन राजनेता लोग की कार्यक्षमता 60 के बढ़ जाती है कैसे? यह तर्क समझ से परे है। आखिर जो कब्र में पैर लटकाए हुए है वह ही राजनीति के शीर्ष पर है, शायद इसीलिए हमारा देश आज बहुत पीछे है और अब विकासशील से भी नीचे जा चुका है। जैसा कि कुछ दिन पूर्व किसी अखबार में पढ़ा था, तो फिर क्यो न इस बार जनता ऐसे किसी भी नेता को वोट न करे जो 60 साल से ऊपर है रिटायरमेंट की उम्र पर हैं।युवा ही देश का भविष्य है क्यो न युवाओ को मौका दिया जाए चाहे वह किसी भी पार्टी का हो।
भारतीय राजनीति के क्षेत्र में 60 साल से अधिक की उम्र के लोगो को आज रिटायर करने की जरूरत है।
अब राजनीतिक दलों के 60 साल से अधिक बयोबृद्ध लोगो को वोट न देकर युवा, कर्मठ, व जुझारू लोगों को मौका दिए जाने की जरूरत है। तभी देश 21 वीं शदी में आगे बढ़ पायेगा।
सहमति असहमति का स्वागत है।।।

।।एक विचार।। 3

संत आसाराम का हश्र देखकर मन सोचने को विवश हो ही जाता है कि ये लोग सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, अपितु कही न कहीं लाखो पुरुषों के भीतर की दमित इच्छाओं और यौन विकृतियों की बेशर्म अभिव्यक्ति भी हैं। यह भाव बहुत से पुरुषों के अंदर निहित है या पाया जाता हैं। यह अलग बात है कि धन, प्रभुत्व, साधन व अवसर के अभाव में ज्यादातर लोगों के भीतर ये घुट-घुटकर दम तोड़ देते हैं क्योंकि यह सब प्राप्त होने के बाद ढोंगी बाबाओं और संतों की ही नहीं, ज्यादातर नवधनाढ्यों, ग्लैमर उद्योग के लोगों, राजनेताओं और अफसरों की दो ही महत्वाकांक्षाएं होती हैं - ऐश्वर्य के तमाम साधन जुटाना और ज्यादा से ज्यादा स्त्रियों से शारीरिक आनंद उठाना अर्थात शारीरिक और मानसिक शोषण , वे स्त्रियां उनके लिए व्यक्ति नहीं, रोमांच, पुरुष अहंकार को सहलाने का ज़रिया और स्टेटस सिंबल मात्र होती हैं। ठीक वैसे ही जैसे राजतांत्रिक व्यवस्थाओं में रनिवास और हरम में रानियों और दासियों की संख्या किसी भी राजा, बादशाह या सामंत की सामाजिक प्रतिष्ठा तय किया करती थी। आज इक्कीसवी सदी में भी तमाम प्रतिबंधों के बावजूद दुनिया के ज्यादातर मर्दों की आंतरिक इच्छा कमोबेश ऐसी ही है।कतिपय जिन लोगों के पास साधन हैं, उनमें से ज्यादातर लोग नैतिकता औऱ कानून को धत्ता बताकर यही कर रहे हैं। उनमें से कतिपय नेता व राम रहीम और आसाराम जैसे गिनती के लोग पकडे जाते हैं, जिनका भांडा अबतक नहीं फूटा, वे सब पुण्यात्मा हैं। 
लेकिन समाज का एक पक्ष यह भी ही कि कतिपय धनाढ़्य स्त्रियाँ भी अपनी मादकता बिखेरती, धनिकों की ही तलाश में रहती हैं? देखा देखी कामवाली बाइ भी सुबह सुबह वही श्रृंगार करती है और सामर्थ्य पुरूष के साथ रहती है। आज के पतन का जितना पुरुष ज़िम्मेदार है उतना ही कतिपय स्त्रियाँ भी, क्योंकि उनमें आनन्द है, तृष्णा है ओर भोग एक स्वाभाविक व्यवस्था जो प्रकृति द्वारा निर्मित है। वैसे भी नदियों की उन्मादकता समुद्र मे ही शान्त होती है।
आसाराम, रामरहीम आज के और पुराने चन्द्रास्वामी में कोई अंतर नहीं। लेकिन एकतरफा पुरूष जाति को जिम्मेवार बनाया जाना 100 प्रतिशत कतई उचित नही प्रतीत होता। कई लोगो का मानना होता है कि यह सच कतई नही है कि केवल पुरूषो द्वारा ही नारी का शोषण किया जाता है। क्योंकि महिला द्वारा भी कई बार कानूनों की आड़ में पुरूषो को शोषित किया जाता है। कतिपय महिलाऐ रोकर मनोव्यथा तब व्यक्त करती है जब उनका स्वार्थ सिद्ध नही होता है। कतिपय महिलाएं भी निहित स्वार्थ के लिए पुरूषों का इस्तेमाल करती हैं। सहमति से सेक्स के बाद या लिव इन रिलेशनशिप के बाद भी बलात्कार आदि के मुकदमे दर्ज करा देती है और न्यायालय में कई केसों में ऐसा सामने आया भी है।
सुंदर लगना नारीत्व का गुण है, लेकिन सुन्दर वस्तु बनना जड़ता का प्रतीक है, जीवन्त मनुष्य का नहीं। स्त्री अवश्य ही सुन्दर लगे अपितु सुन्दर दिखने का प्रयास करे पर, पुरुष के लिए भोग्या बनने के लिए नहीं अपितु इसलिए कि सुन्दरता एक गुण है, विशेषता है, स्त्री का सुन्दर व आकर्षक लगना, उसका स्वभाव है, गुण है , एक मानवीय बोध है।
स्त्री की अपनी राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और यौनिक अस्मिता एक अति आवश्यक कारक है। अंततोगत्वा इन सब विषयो के मानकों के निर्धारण के कतिपय प्राकृतिक कारण भी हैं। अतः अत्यधिक एक्स्ट्रापोलेशन कर सिर्फ एक पक्ष के अस्तित्त्व को ही जकड़ देना अनुचित है।
सहमति और असहमति का स्वागत है,,,,
***लेख का उद्देश्य किसी की किसी की भावनाओं को आहत करना कतई नहीं है।।

।। नेट पास उम्मीदवार घूमेंगे पीएचडी वालों की होगी मौज।।


करीब दो दशक पहले शिक्षकों की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए शुरू किए गए राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) को अब शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चत करने के नाम पर ही गैर-जरूरी बनाया जा रहा है. वर्ष 2021 से लागू होने जा रही विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यता संबंधी नई नियमावली के तहत पीएचडी धारक उम्मीदवार बिना नेट उत्तीर्ण किए असिस्टेंट प्रोफेसर बन सकेंगे। अर्थात उच्च शिक्षा के संवर्धन हेतु प्रोफेसर की योग्यता के मापदंड में जो परिवर्तन किया है वह इतना श्रेष्ठ परिवर्तन है कि जो लोग नेट उत्तीर्ण हैं उनको विश्वविद्यालयों में चयन नहीं किया जाएगा बल्कि जो कैंडिडेट Ph.D कर लेंगे या पीएचडी किए हुए होंगे। उनकी विशेष योग्यता व समर्पण को समझते हुए सरकार उन्हें सहायक प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति प्रदान करेगी व उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाएगी। क्योंकि पीएचडी किये हुए लोगो के नेट उत्तीर्ण करते ही या अनिवार्य किये जाने से उच्च शिक्षा की गुणवत्ता गिर रही है। तब प्रश्न ये उठता है कि आखिर नेट का एग्जाम क्यो शुरू किया गया था। उच्च शिक्षा की गुणवत्ता गिराने के लिए या बढ़ाने हेतु, इससे भी बड़ी बात कि अधिकतर यह वह लोग हैं जो कभी अपनी अयोग्यता के चलते नेट उत्तीर्ण नही हुए या कर पाये, थक हार कर के किसी प्रकार से गुरुकृपा से पीएचडी कर लिए हैं। सरकार की नजर में अब वह योग्य व अधिक गुणवत्ता युक्त हो गए हैं । 95% पीएचडी भारत मे कैसे होती हैं सभी लोग जानते हैं। हालांकि बहुत सी पीएचडी वास्तव में विश्वस्तरीय भी होती हैं और गुणवत्तापूर्ण भी। लेकिन बहुतायत में पीएचडी धारक स्तरहीन अधिक ही हैं जो खुद यूजीसी भी कई बार चिन्हित कर चुका है। यह तथ्य किसी भी उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति से छिपा हुआ नहीं है। लेकिन अब यह अभ्यर्थी जो नेट नहीं उत्तीर्ण कर पा रहे हैं लेकिन सरकार की नजर में उपयुक्त हैं वह ही विश्वविद्यालय हेतु पात्र भी होंगे क्यो? यह एक महत्वपूर्ण बात है और विडंबना देखिए इस देश में लगभग 5 से 8 लाख नेट उत्तीर्ण लोग मारे मारे फिर रहे हैं जिनमे से 1 या दो लाख पीएचडी भी है और फिर भी इस समय पूरे देश के कालेजो व विश्विद्यालयो में लगभग डेढ़ लाख नियमित पड़ रिक्त हैं । आख़िर जब नेट उत्तीर्ण लोग पीएचडी कर सकते हैं तो पीएचडी वाले नेट क्यों नही कर सकते। क्या दिक्कत है। जब सरकार को एक साथ दोनो ही डिग्री धारक पर्याप्त मिल रहे हैं तो एकतरफा पीएचडी वालो को लाभ किसलिए , वह भी गुणवत्ता के नामपर गुणवत्ता पर ध्यान क्यो नही है? यह साजिश किसको लाभ पहुंचाने के लिए हो रही है?
नेट क्या है राष्ट्रीय स्तर की एक राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा जिसका उद्देश्य था प्रत्येक शिक्षक में विषय के प्रति समुचित ज्ञान का मूल्यांकन करने की परीक्षा।
पीएचडी क्या है किसी एक टॉपिक पर शोध । अध्ययन-अध्यापन को बेहतर विषयपरक बनाने हेतु नेट की परीक्षा प्रारम्भ की गई थी। बाद में जैसे माध्यमिक व बेसिक हेतु टेट। ताकि नूनतम योग्यता का निर्धारण हो सके। क्योंकि जो नेट उम्मीदवार होगा उसने पूरा सिलेबस पढ़ा होगा पूरे पाठ्यक्रम को तैयार किया होगा, उसके अनुरूप राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा उत्तीर्ण होगा, । लेकिन वह विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बनने के योग्य नहीं होगा ?।
घालमेल यहां पर इतना ही नहीं है और भी है कि शिक्षकों की नियुक्ति हेतु कॉलेजो की ही भांति हैं राज्य व केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भी एक पारदर्शी चयन आयोग हो उस पर किसी का ध्यान नही है। यह पीएचडी धारक अब एक इंटरव्यू से ही प्रोफेसर भी बन जाएंगे क्योंकि विश्वविद्यालय में चयन हेतु लिखित परीक्षा या स्क्रीनिग तक नही होती है और बिना कोई एग्जाम जोर जुगाड़ से यह भी पौ बारह।
वर्तमान में विश्वविद्यालयो में भाई-भतीजावाद, नाते रिश्तेदारी, गुरु शिष्य परम्परा, के या जुगाड़ू प्रोफेसर ही अधिकतर पाए जाते हैं । आजकल इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कालेजो का चयन प्रकरण चर्चा का विषय भी है। सबक भी। यानी अब मान लिया जाए कि, कुछ लोग अपनी निकम्मी औलादों और रिश्तेदारों को विश्वविद्यालयों और कालेजों में पहुँचाने के लिए ये कुचक्र रच रहें हैं । यही जिम्मेदार लोग देश और शिक्षा के दुश्मन भी हैं । आखिर किसी भी विद्वान को NET पास करने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए। दूसरे अनिवार्य योग्यता NET+Ph.D दोनो ही अनिवार्य क्यो नही कर दिया जाना च्चाहिये, जिससे इस तरह के प्रश्न चिन्ह ही समाप्त हो जाए। आखिर पीएचडी किये हुए लोग नेट क्यो न पास करें। दिक्कत क्या है नेट करने में। व नेट किये हुए लोग पीएचडी भी करे।
केंद्र सरकार ( UGC NET ) की पात्रता परीक्षा और राज्य सरकार ( SLET ) की पात्रता परीक्षा पास युवा आज पूरे देश मे बेरोजगार घूम रहे है और सरकारे कहती हैं कि कि उसे योग्य कैंडिडेट नही मिल रहे है । अरे कोई पूछे इनसे, कि इन्ही के द्वारा निर्धारित परीक्षा पास करने वाला युवा अगर योग्य नही है तो फिर कौन योग्य है ।
कहीं यह पूरी साजिश आपने बच्चों को रोजगार दिलाने के लिए तो नही रची जा रही है क्योंकि विदेशों में पीएचडी तो इन्ही अधिकारियों और नेताओं के बच्चे कर सकते है ना कि एक मिडिल क्लास परिवार ।
अंततोगत्वा विश्वविद्यालय व कालेजो में चयन आयोग द्वारा ही हों व सहायक प्रोफेसर के चयन हेतु अनिवार्य योग्यता NET+Ph.D दोनो ही अनिवार्य कर दिया जाना च्चाहिये, जिससे इस तरह के प्रश्न चिन्ह ही समाप्त हो जाए। पीएचडी किये हुए लोग नेट पास करें। दिक्कत क्या है नेट करने में। व नेट किये हुए लोग पीएचडी भी करे।
सहमति असहमति का स्वागत है।

एक विचार 2


कुछ दिन पूर्व पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के नाम पर चंदौली जिले का मुगलसराय जंक्शन का नाम बदलकर अब पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन कर दिया गया था। इस परिवर्तन से यात्रियों में ये उम्मीद जगी थी कि शायद अब यह से गुजरने वाली ट्रेनें ही समय से चलने लगेगी, अगर कुछ और नही सुधरा तो, लेकिन ऐसा कुछ भी नही हुआ, स्थिति पूर्ववत है।
इसी प्रकार आजकल यूजीसी का नाम बदल कर उच्च शिक्षा आयोग किये जाने का ड्राफ्ट चर्चा में है और कहा जा रहा है कि इससे गुणवत्ता में अभूतपूर्व सुधार होगा। लेकिन लोग निहितार्थ कुछ और ही निकल रहे हैं। काश अबकी वास्तव में कुछ बदलाव आए सिर्फ प्रोपोगंडा मात्र न हो???
अर्थात स्थापित सत्ताधारी और उसके समर्थक सुधार का ढोंग कर यह भ्रम बनाने की कोशिश करते हैं कि 1-जो है वह ख़राब है ,2- वे बेहतरी के लिये बहुत चिंतित हैं !
जबकि उनका असली मक़सद निजी फ़ायदों के लिए मौजूदा प्रतीकात्मक ही सही , लोक उत्तरदायी ढाँचा को नष्ट कर बाज़ार के अनुकूल परिवेश निर्माण है ।
यह राजनीतिक अर्थव्यवस्था के लगभग सभी हलकों (sectors) में हो रहा ।
उनके सुधार के मानक भी जन हित विरोधी हैं।
कोई पूछे कि ज्ञान के निर्माण, अविष्कार, संग्रह, प्रयोग, परिष्कार , सातत्य, बदलाव, विस्तार और प्रसार का लक्ष्य क्या निजी पूँजी की चाकरी है ?
या उसका समाजोपयोगी और मुक्ति दायी होना ?
——
कोरपोरेट लोन माफ़ी के लिए अरबों रुपए पर कोई बहस नहीं पर लगातार शिक्षा के गिरते बजट को ‘सुधार’ मानना तथा इसे बाज़ार की दान दया पर छोड़ना - इसी अधोगामी तर्क का विस्तार है ।
क्या दुनिया भर के दक्षिणपंथी तर्कों और बहसों से लोग अनभिज्ञ हैं -जिसने मानवीय गतिविधि और संस्था -दोनों के रूप में “चेतना” को एक हिंसक, अवैज्ञानिक , मनुष्यता विरोधी और यथास्थितिवादी औज़ार में तब्दील कर दिया है ?
।।कतिपय fb कमेंट से साभार।। शशिकांत सर् 👍👌!!
सहमति असहमति पूर्ण आपके विचारों /कमेंट्स का स्वागत है, ।।
*लेख का उद्देश्य किसी का भी या शासकीय नीति का विरोध करना नही है अपितु शोधपरक पहलुओं की खोज करना है।
** न ही व्यक्तिगत है।

एक विचार 1

।।एक विचार।।
मैंने हाल ही में संचार माध्यमों से पढ़ा व सुना है की संघ लोक सेवा आयोग युवा अधिकारियों की भर्ती करने हेतु सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों की उम्र सीमा अधिकतम सिर्फ 26 वर्ष करने जा रहा है ताकि देश का प्रशासन देश के सामान्य वर्ग के युवा भली-भांति संचालित कर सकें तब मेरे मन में एक प्रश्न यह उठता है कि जब प्रशासनिक अधिकारी युवा होने चाहिए, कमजोर सरकारी कर्मचारी 50 साल की उम्र में रिटायर हो जाना चाहिए या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति दे दी जाए। अधिकतम 60 साल की उम्र में रिटायर कर ही दिए जाते है क्योंकि सरकार की नजर में 60 कई उम्र के बाद कही न कही यह बुजुर्ग लोग विकास को अवरुद्ध कर रहे होते हैं तब प्रश्न उठता है कि फिर यह हमारे राजनेता लोग 60 से 80 साल की उम्र में ही सबसे ज्यादा कहां से ऊर्जा प्राप्त करते हैं यह कौन सा ऐसा शंकारा पीते है, कहां से इनमें प्रशासनिक क्षमता का जोरदार विकास हो जाता है जो यह येनकेन प्रकारेण राजनीति के केंद्र व शासन में सर्वे सर्वा बने ही रहना चाहते हैं । जनता भी ऐसे ही अति बृद्ध नेताओं को क्यों जिताना चाहती है क्या वास्तव में इस देश के प्रशासन को संचालित करने में आखिर बिना कमोड के लैट्रिन तक न करने वाले लोग ही अब विकल्प बचे हैं इस देश मे? कही यह सत्ता के लिए देश को पीछे ले जाने की साजिश तो नही है।
आखिर जो राजनेता कब्र में पैर लटकाए हुए है सामान्यतया सर्वत्र वह ही राजनीति के शीर्ष पर है, शायद इसीलिए हमारा देश आज बहुत पीछे है और अब विकासशील से भी नीचे जा चुका है, जैसा कि कुछ दिन पूर्व किसी अखबार में था, तो फिर क्यो न इस बार जनता ऐसे किसी भी नेता को वोट न करे जो 60 साल से ऊपर है, रिटायरमेंट की उम्र पर हैं। युवा ही देश का भविष्य है क्यो न युवाओ को मौका दिया जाए चाहे वह किसी भी पार्टी का हो। हम पार्टी आधारित क्यो हों।
विदित हो कि भारतीय राजनीति के क्षेत्र में 60 साल से अधिक की उम्र के लोगो को आज रिटायर करने की गुरुतर आवश्यकता है। इसे इस देश के युवाओं को व 60 साल से कम उम्र व देश को आगे ले जाने की परिकल्पना करने वालो को सोंचना ही होगा।
अब राजनीतिक दलों के 60 साल से अधिक बयोबृद्ध लोगो को वोट न देकर युवा, कर्मठ, व जुझारू लोगों को मौका दिए जाने की जरूरत है। तभी देश 21 वीं शदी में आगे बढ़ पायेगा।
सहमति असहमति का स्वागत है।।।

Nov 24, 2015

National Seminar on "SWACHH BHARAT CAMPAIGN 2014: Administrative Perspectives Issues and Challenges" "

Dear Sir /Madam...It's a matter of great pleasure to inform you that DEPARTMENT OF POLITICAL SCIENCE
Govt. Girls P.G. College, Bindki, Fatehpur. UP is organizing two day (04-05 Jan 2016) National Seminar on "SWACHH BHARAT CAMPAIGN 2014: Administrative Perspectives Issues and Challenges" "स्वच्छ भारत अभियान, प्रशासनिक परिप्रेक्ष्य, मुद्दे और चुनौतियाँ" sponsored by ICSSR, Ministry Of HRD Government of India. Cordially you are invited.......Convener Mr. Arvind Shukla.. Call/Write...09236807279-9026809646/
arvinddbsk@gmail.com

INTRODUCTION
About the College:
          The first step is always a small step. The college was established in 1996  and since then has played an important role in the promotion of higher education among girls of Bindki and adjoining areas. The College started as an Arts Graduate College in 1996 and today it is a Post Graduate College with Post Graduation in three subjects in Humanities and Commerce at Graduate level under process. During this decade long journey the college has set up many milestones besides many other successes and achievements. It has been a journey with the vision & mission of quality & relevant education. It aims at preserving traditional knowledge and intellectual heritage as well as generating innovative activities in the field of higher education. Since its establishment in 1996, the College has not looked back. It has scaled new heights under the joint venture of various learned and eminent Principals, faculties, staff and students. Government Girls P.G. College, Bindki, Fatehpur looks forward to continue its vision and mission of providing accessibility and imparting ‘quality education’ to the girls of Bindki and adjoining areas.. In a span of 20 years, the College has progressed leaps and bound to emerge as a leading centre of higher education.


About the Political Science Department:
 
       The Department of Political Science was established in the College in 1996.  P.G.  Classes has been running it successfully since 2008. The department is dedicated to promote teaching and research in the emerging fields of political science like public policy and governance, comparative politics, international relations and human rights while maintaining the scholarship in some of the conventional fields like political thought, political philosophy etc. The department has two teachers and around 618 students. Since its inception, the department has been concentrating on maintaining global standards in its teaching as well as research programmes. its teachers are deeply interested in understating the social problems around them. The department is committed to give new directions to the teaching methods and research areas in the discipline.

About the Host City :
 

    Bindki is a Historical place in india. It is a very old city and was named after its emperor ‘Raja Venuki’ it is also the birth place of renowned Hindi Poet ‘Sohan Lal Dwivedi’. Bindki is also associated with first war of independence in 1857. 52 Freedom Fighters were hanged to death from the ‘Bavani imli’ Tree  ‘on 28th April 1858 By Britishers. It is about 25 kms. From Fatehpur and  52 kms. From Kanpur .


Theme of the Seminar:


   ‘SWACHH Bharat Abhiyan (Clean India campaign) is a national campaign by the Government of  India, covering 4041 statutory towns,  to clean the streets, roads and infrastructure of the country. This campaign was officially launched on 2 October 2014 at Rajghat, New Delhi, where Prime Minister Narendra  Modi himself cleaned the road. It is India's biggest ever cleanliness drive and 3 million government employees and school and college students of India participated in this event. The mission was started by Prime Minister Modi, who nominated nine famous personalities for the campaign, and they took up the challenge and nominated nine more people and so on (like the branching of a tree). It has been carried forward since then with people from all walks of life joining it. This campaign aims to accomplish the vision of a 'Clean India' by 2 October 2019, the 150th birthday of Mahatma Gandhi. It is expected to cost over 62000 crore (US$9.8 billion). Fund sharing between the Central Government and the State Government and Urban Local Bodies (ULBs) is 75%:25% (90% : 10% for North Eastern and special category states).  The campaign has been described as "beyond politics" and "inspired by patriotism".
       
       Nearly 100 million people in India lack access to safe drinking water and over 700 million continue to defecate in the open. Over 600,000 children under 5 years lose their lives to water and sanitation related diseases like diarrhoea and pneumonia every year. Though we are making efforts in this direction since Gandhi Ji’s call for clean India. There are organizations like Sulabh International with a purpose to provide clean and hygienic defecation place, to innumerable other NGOs, central and state government departments of public health, child care etc. who are working to make the country a better living place. Big campaigns like Narmada Bachaao, Clean Ganga, Clean Yamuna are few other efforts which can be witnessed in this direction. Previous governments have also made attempts in these directions by allocating huge budgets to total sanitation drives, but we still are standing far behind the goal because of the challenges of controlling the usage of hazardous materials and their waste deposition in open and rivers.
       
       With Prime Minister’s appeal to the nation for Swachh Bharat Abhiyan, there has been an overzealous positive sentiment in organizations and individuals both. Many organizations have routed their CSR budgets in this direction. However, if the campaign is to go beyond symbolism and actually achieve the goal of making India open defecation free by 2019, it needs a multi-pronged strategy encompassing sustained involvement of multiple stakeholders, focusing on changing behavior, going beyond toilet construction and fund allocation.            
                It is an inclusive responsibility of not only the politicians and government officials, but each and every citizen of India. A lot has to be done to achieve this national goal. The present conference is an attempt to give a platform to these NGOs, Central and State Government Departments, Education Institutes, Public and Private Organizations, and various agencies to share their ideas of clean India with respect to Administrative perspectives they are adopting, challenges and issues faced and future roadmap for the success of the campaign.


SUB THEME:

*Human Resource Initiatives & Clean India campaign

*
Environmental challenges, Issues, monitoring & controlling process

*
Sanitation Issues, Legal Issues & waste management

*Strategies to market the concept of Swachh Bharat

*
Grey Area, Policies and Practices,  Social Marketing, Social Awareness and Sensitization
*
Role of NGOs ,  Social Volunteers, Public & Private organizations &  Especially Consituted Agencies.


*Startegic Initiatives by Government departments, PSUs, Private organizations etc

*Clean India campaign & Social Media,

*Clean Economy and sustainable development


Guidelines for abstract/paper submission:


 Participants are requested to submit papers/abstract for oral or poster presentations. Abstract should not exceed 300 words. The text should be typed in Times New Roman font (12 points) for English and Kruti Dev 10 font (14 point) for Hindi with single spacing in MS Word.Manuscripts should preferably not exceed 12 printed pages or between 2000-4000 words. The research paper should be preceded by an abstract, Maps, tables and charts should be in black and white only.
         
  They should be serially numbered, sequentially, following references to them in the text. The general format of the research paper should consist of : (i) Title (ii) Author(s) name and affiliation with email ID(s) (iii) Abstract with 4-8 keywords (iv) Introduction (v) Objectives (vi) Study area (vii) Data base and methodology (viii) Text-interpretation-analysis (ix) Conclusion (x) References (xi) Full corresponding address of author(s) with contact no.(s) and email ID(s).


 Note:
1.  The delegates will  be paid   TA/DA for participating in the Seminar as per ICSSR & UP Govt. Norms.
2.  Time allotted for each paper presentation – 10 minutes.

3.  The contents of invitation letter are available on the College website  www.gdcbindki.org
4. The manuscript should be accompanied by a declaration letter that the paper is original and has not
     been submitted elsewhere for publication.    


The abstract along with full length paper must be submitted to Organising Committee either in C.D. or through e-mail on or before 15th Dec 2016 to - E-mail : arvinddbsk@gmail.com


Kindly circulate the information among friends and colleagues for wide publicity.


Post Conference Publication:
         
  Selected papers presented in the seminar will be published in Special Volume-1 & 2, an edited book entitled “SWACHH BHARAT CAMPAIGN 2014: Administrative Perspectives  Issues and Challenges” with ISBN.


Accommodation:
   
       The delegates, who want to stay are requested to intimate the Organizing Secretary by 30 th Dec, 2015 so that comfortable arrangements for boarding and lodging can be made.

Important Dates:
Last  date  for  submitting  of  abstract and  full  papers: 15 /12/2015
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REGISTRATION  FEE:
           Registration Fee will be paid in cash or by a Demand draft/Multi City Cheque  in  favour of  "Principal, Govt. Girls P.G. College Bindki, Fatehpur" payable at Bindki should be sent on or before 25th Dec 2015.

 Catanegory Registration
(on or before Dec 25th 2015) Registration on spot
 Academicians ₹500/-₹ 600/-
 Research Scholars ₹ 300/- ₹ 400/-

We look forward to welcome you at the Seminar.
   
  With warm regards,
Mr. ARVIND KUMAR SHUKLA
(M) 9026809646, 9236807279
Email: arvinddbsk@gmail.com
Organizing Secretary,
Postal Address:
DEPARTMENT  OF  POLITICAL  SCIENCE
GOVERNMENT  GIRLS  P.G. COLLEGE
BINDKI,  FATEHPUR -212635 (U.P.)

विवाह का एक सच यह भी है

" शादी व्यक्ति को कमजोर और बेहद डरपोक बना देती है, बल्कि एक बेहद औसत दर्जे का इंसान बना देती है। शादी बहुत ही आर्टीफीशियल चीज है। यह कई सारे डूज़ ऐंड डोन्ट्स के साथ आती है। यह आपको आपके चुके हुए टाइप के  वर्ज़न पर ले जाती है। शादी के कारण आप किसी दूसरे की उम्मीदों को पूरा करने के लिए रोल्स प्ले करने लगते हैं। शादी के पहले लोग वैसा ही बोलते हैं, जैसी चीजें वास्तव में होती हैं, परन्तु शादी के बाद ऐसा होना बहुत कम पाया जाता है , जो लोग शादीशुदा रहते हैं, वे शादी से ज्यादा नफरत करते पाये जाते हैं। यह भी एक शास्वत सत्य सा है कि फिर भी विवाह के प्रति सभी में आकर्षण हिलोरें मारता ही रहता है, चलो अच्छा ही है इस डगर में भी नौजवा अनवरत शहीद हों, विवाह का सीजन भी आ रहा है। सामान्यतया  वैयक्तिक दृष्टि से विवाह पति-पत्नी की मैत्री और साझेदारी है। दोनों के सुख, विकास और पूर्णता के लिए आवश्यक सेवा, सहयोग, प्रेम और निःस्वार्थ त्याग के अनेक गुणों की शिक्षा वैवाहिक जीवन से मिलती है। मगर यह सब दिखता नहीं है या वहां तक नजर  नहीं जा रही      --------------------------------सहमति और असहमति --------------------------?

जीवन की विडम्बना

इस जीवन की विडम्बना है ..एक वक़्त ऐसा था जब ज़िंदगी समुन्दर कि लहरों कि भांति स्वच्छंद थी, किसी के घेरे में सिमटी हुई नहीं थी, मगर आज समय के घेरे में सिमटती चली गई है, अपितु समय के  घेरे से  ज़िंदगी चुपके से झुक कर निकल भी गई है अर्थात एक ऐसा वक्त, जब ना बाहें हैं, ना घेरा है और ना ही वह ज़िंदगी, जिसकी कभी हर एक सांस हमारी होती थी।
     नज़रें घुमा कर देखता हूँ तो लगता है कि ज़िंदगी कहीं दूर, किसी कोने में व्यंग से मुस्कुरा रही है और  वक़्त आकर चला गया है या यूं कहूँ की बस छू के चला गया है। अब तो वो जगह भी नहीं दिखाई दे रही जहां अपनी पहचान छिपी हो, अपने कदमों के निशान छिपे हो, सच! कहाँ से कहाँ आ गए ? यदि यही आना था तो चले ही क्यों थे, सपने ही क्यूं देखे थे? आज आँखें कुछ खोज सी रही हैं। आज मन कहीं कुछ ढूंढ़ रहा है। मन का भाव तो वही है पर तरीका बदल गया है। माथे पर आज शिकन है। हाथों मे एक दबाव ना होकर एक फिसलन है। पैरों की गति धीमी है। आज मेरी सांस फूल गई है और सीने का उतार चढ़ाव हरेक धड़कन की गिनती का हिसाब दे रहा है। जीवन के इन वर्षों में मैंने न जाने क्या-क्या देखा- आते-जाते दिन-रात, आश्चर्यचकित कर देने वाले उतार-चढाव, आशा-निराशा का संघर्ष और बनते-बिगड़ते सम्बन्ध, इक्कीसवीं शताब्दी में अब हम इतने साधन संपन्न हो गए हैं कि बीसवीं शताब्दी की शुरूआती तकलीफों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। उस युग के मध्यम वर्ग के लिए पेट भरना बहुत बड़ी समस्या थी। बिजली नहीं, पानी नहीं, स्कूल नहीं, अस्पताल नहीं, सड़कें नहीं, आने जाने के साधन नहीं। न जाने किस तरह वे लोग जीते रहे होंगे ? फिर भी लोग जीते थे। विश्व में असंख्य प्राणी जन्म लेते हैं और पुराने प्राणियों को प्रतिस्थापित कर देते हैं। भू-संरचना, जलवायु, वनस्पति और जलप्रवाह निरंतर परिवर्तित होते हैं।  इन 32 वर्षों की जीवनयात्रा ने कई सबक सिखाए, कुछ समझ में आए, कुछ नहीं आए। मेरा यह निष्कर्ष बनता  जा रहा है कि वक्त से मुकाबला करना  मेरे वश में नहीं है, हम वक्त के गुलाम हैं। बहती हुई तेज धार के विपरीत तैरने वाले कुछ साहसी लोगही समय से टक्कर लिया करते हैं लेकिन मैंने आज  स्वयं को धार की अनुकूल दिशा में डाल दिया। अब तक मेरा आधा जीवन बीत गया। कोल्हू के बैल की तरह, मैं जहाँ से शुरू हुआ था, गोल घूमकर वहीं खडा हूँ। आज मेरी अपनी औकात क्या है ? अपने परिवार का बंधुवा मजदूर।  जिन्दगी तो खैर चलती रहेगी, जब तक साँस है, तब तक आस है लेकिन सच यह है कि इस दुनियां में, इस देश में जन्म लेकर मुझे साँस लेने में बहुत असुविधा हो रही है। मेरी हालत उस मरीज की तरह है जो आक्सीजन के भरोसे जिंदा है पर मन-ही-मन मना रहा है कि कोई आक्सीजन पाइप खींच कर निकाल दे तो छुट्टी मिले। नतीजा…ज़िंदगी बस चल रही है…शायद घिसट भर रही है क्यूंकि उसकी बैसाखी कहीं गिर गई है या फिर शायद उसे किसी ने खींच कर एक ओर पटक दिया है और जिंदगी बस मंथर मंथर अंतहीन सी चल रही है हम प्रवाह मात्र हैं कतिपय परिवर्तन करने कि स्थिति में नहीं …यही इस जीवन की विडम्बना है ...........

क्या कहूँ, क्या हूँ मैं उद्भ्रांत? विवर में नील गगन के आज

वायु की भटकी एक तरंग, शून्यता का उज़ड़ा-सा राज़।

एक स्मृति का स्तूप अचेत, ज्योति का धुँधला-सा प्रतिबिंब

और जड़ता की जीवन-राशि, सफलता का संकलित विलंब।"

मानवीय प्रवृत्ति एक अनुभव

किसी भी विचार की थाह में ना जाना कतिपय  पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहना यह कैसी नैतिकता है , समझ नहीं आता। यदि कोई विचार आता है तो उसके पीछे कतिपय कारण, लेखक के पूरी की पूरी सोंच या समझ, उसके तथ्य, तथ्यों की व्याख्या, लेखक का इतिहास बोध, उसकी मान्यताये और वह लक्ष्य भी निहित रहते हैं जिसके लिए किसी भी विचार का प्रतिपादन किया जाता है। आजकल हमारे देश में विचारों की हत्या करनें की कोशिशें अपनें चरम पर है यदि आप मोदी जी से  सम्बद्ध देश हित में कोई बात कहते हैं तो आप मोदी भक्तो के शिकार हो जाते हैं । यदि आप भ्रस्टाचार पर आक्षेप करते है तो इसमें सलग्न लोगों के शिकार हो जाते है, यदि आप नारीवाद पर सकारात्मक टिप्पडी भी करते हैं तो तथाकथित नारीवादियो , पुरुष स्त्रायन  वर्गं के शिकार हो जाते है और भूल से भी आप सामाजिक न्याय की बात करते हैं तो विशेषाधिकारवादी लोग सामने आ जाते हैं । फिर विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कैसी।  आखिर कतिपय  नकारात्मक प्रकृति के लोग जब सब महसूस करते हुए भी सत्य के साथ खड़े नहीं होना चाहते तब बड़ा दुःख होता है। लोग अपनी आत्मा के साथ भी न्याय क्यों नहीं  करना चाहते?
कतिपय अनुत्तरित।।।

Nov 19, 2015

बिहार के परिणाम का एक सच यह भी है

बिहार के परिणाम आने के बाद कोई कुछ भी कहे लेकिन यह बात उन्हें खुले ह्रदय से माननी ही चाहिए कि ये मोदी जी की ही हार है। उन्होंने अपने चुनावी वादे पूरे न करने की जो कसम खायी है और यह हार मोदी जी के भक्तों के मुह में तमाचा है जो मोदी जी की कथनी और करनी का मूल्यांकन ही नहीं करना चाहते हैं और हाशिये से गायब लालू जी जैसे राजनेता जीत रहे हैं। यह देश के लिए दुर्भाग्य पूर्ण है लेकिन बिहार के वोटरों पर ऊँगली उठाने वाले तथाकथित लोग अपने आप में ही अपना मूल्यांकन करें। मतदाताओं पर अनर्गल टिप्पणी न करें क्योंकि नितीश जी ने बिहार में वास्तव में काम किया है और वह सभी को दिख भी रहा है यह एक सच्चाई है जो वहां की जनता जानती है। आज भूमंडलीकरण का युग है जो दिखता है वही बिकता है और अभी डेढ़ साल में मोदी जी का कुछ "अच्छे दिन" दिख नहीं रहा है। बिहार के चुनाव सिर्फ और सिर्फ मोदी जी के नाम पर  लड़े गए थे वह ही इस चुनाव के मुख्या चेहरा थे यह देश का बच्चा बच्चा जानता है। इसलिए यदि तठस्थ होकर विचार करेंगे तो ये सिर्फ और सिर्फ मोदी जी की ही हार है। वैचारिक सहमति और असहमति बौद्धिकता का एक आवश्यक कारक है। लेकिन मोदी जी यदि अपने चुनावी वादे पूरे नहीं करेंगे तो आगे के चुनावों में भी इसी तरह उनकी हार होगी और लोकसभा चुनावों में 2004 की तरह अटल जी से भी बुरी तरह हारेंगे क्योंकि भारत की जनता को उन्होंने 2014 में जो सपने दिखाए हैं उनसे आज अब वह मुकरने की स्थिति में नहीं है चाहे कितना ही मिडिया का दोहन किया जाये। प्रधानमंत्री पद का वही महत्व है जो उस पद पर बैठा व्यक्ति उसे प्रदान करें और देश की जनता जान गयी है की मोदी जी सिर्फ और सिर्फ आजकल गप्प बाजी कर रहे हैं। भारत के प्रधानमंत्री होकर चुनाव प्रचार में अमर्यादित भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। ठोस काम नहीं। वह हर रैली में नितीश जी से ढाई साल के काम का जवाब माग रहे थे लेकिन अपने डेढ़ साल के काम का जवाब नहीं दे रहे थे। भारत के प्रधानमंत्री केवल पिछड़े दलितों के लिए जान की बाजी लगा रहे हैं तो क्या दूसरों का ये देश नहीं है। अन्य धर्म के लोगों समेत सवर्णों की जिम्मेदारी क्या प्रधानमंत्री जी आपकी नहीं है? राजनीति की यही 'गंदी बातें' हैं जो लोकतंत्र को लंबे समय से गंधवा रही हैं ,  सत्ता पाने की लालसा या सत्ता शक्ति के प्रदर्शन का अहंकार कहीं न कहीं राजनीति का स्तर गिराता जा रहा है। अभी महगाई चरम में है और सरकार को महसूस नहीं हो रही और अनवरत महगाई के स्तर को नकारात्मक गिरावट  दिखाकर डेढ़ वर्ष से भाजपा सरकार डेटा में छेड़खानी करके कर्मचारियों को महगाई भत्ता कम देने का काम कर रही है और 7 वें वेतन आयोग की जब रिपोर्ट आ जायेगी तब सरकारी कर्मचारी और उनका परिवार भी मोदी से विमुख ही हो जायेगा क्योंकि वह कर्मचारियों को भी कुछ देने के मूड में प्रतीत नहीं हो रहे है, ये बात भी शायद मोदी जी भूल गए। इनकम टैक्स की लिमिट बढ़ानें में देरी मध्यवर्ग से भाजपा को दूर कर रही है और आम लोग तो महगाई से और भी परेशान ही हैं। शिक्षा का बजट कम कर दिया गया है ICSSR, UGC पैसे की कमी से जूझ रहे है केंद्र सरकार ने अकेले पेट्रोलियम उत्पादों से 34000 करोड़ का लाभ कमाया है गैस सब्सीडी छोड़ने के विज्ञापन में  करोड़ों रुपया खर्च किया है जबकि सब्सिडी छोड़ने से मात्र सरकार को लगभग 100 करोड़ का ही लाभ हुआ है। ऐसे और भी योजनाओं में हो रहा है । मीडीया को विज्ञापन देकर मोदीमय बनाया जा रहा है। लेकिन अब समय आ गया है। मोदी जी को विदेश भ्रमण छोड़कर देश में ही समय बिताना चाहिए और देश की समस्याओं को दूर करनें हेतु देश की समस्यायों का निरिक्षण कर कारक सम्बंधित लोगों पर कठोर कारवाही करनी चाहिए। जिससे लोग भ्र्ष्टाचार करनें से डरें। भ्रष्टाचारियों के मन में भय पैदा हो। देश में राजमार्ग टूटे हैं और सरकार पोषित गुंडों द्वारा टोल टैक्स लिया जा रहा है, लोग महगाई से परेशान हैं, जातिगत वैमनश्य दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है,   समान नागरिक संहिता की पहल अब तो खुद कोर्ट कर रहा है फिर देरी क्यों आदि अनेक जमीनी सच्चाइयाँ हैं जिनका निदान हो। लोगों को भ्रस्टाचार मुक्त भारत महसूस हो। लोगों को वास्तव में अच्छा लगे अच्छे दिन आवें। अन्यथा उत्तर प्रदेश में इससे भी बड़ी हार से भाजपा को कोई नहीं बचा पायेगा और सारे मोदीभक्त सर पीटते रह जायेगे।।। दुर्भाग्य से लेखक भी मोदी जी का समर्थक है ।।।

Jul 21, 2015

जनसूचना अधिकार

जनसूचना अधिकार से तात्पर्य सूचना के अधिकार अधिनियम के अधीन योग्य सूचनाएं प्राप्त करने से है जो किसी लोक प्राधिकारी द्वारा उसके नियंत्रण क्षेत्र से प्राप्त किया जा सकता है। भारत में सूचना अधिकार अधिनियम 11 मई, 2005 को पारित हुआ और उसके 121 दिन बाद 12 अक्टूबर, 2005 को जम्मू काष्मीर को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में लागू कर दिया गया। अधिनियम की धारा 2(1) के अनुसार आम नागरिकों को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त है -

 1 किसी दस्तावेज, पाण्डुलिपि या अभिलेखों का निरीक्षण।
 2 किसी दस्तावेज या अभिलेखों के नोट्स संक्षेपण या सत्यापित प्रतियां प्राप्त करना।
 3 किसी वस्तु का प्रमाणित नमूना प्राप्त करना।
 4 जहां सूचना कम्प्यूटर या किसी अन्य माध्यम में हो तो उसे फ्लापी, सीडी, टेप, विडियो कैसेट आदि रूप में प्राप्त करना।इनमें रिकार्ड,दस्तावेज, ज्ञापन, आदेष, लाग-बुक, अनुबन्ध, रिपोर्ट, पत्रक, नमूना,प्रतिरूप, इलेक्ट्रानिक रूप में डाटा और किसी निजी संस्था से सम्बन्धित जानकारी शामिल है।यह अधिकार भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार के रूप में अनु0 19 के 1 (क) के अधीन भाषण व अभिव्यक्ति से जुड़ा हुआ है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (1948) के अनु0 19 में ‘मत रखने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जोर दिया गया है। साथ ही नागरिक और राजनैतिक अधिकारों की अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा 1966 के अनु0 19 में भी मत रखने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लेख है। भारतीय संविधान के अनु0 21 में स्पष्ट शब्दों में लिखा है-‘‘किसी व्यक्ति को उस के प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है अन्यथा नहीं। तात्पर्य यह कि सूचना प्राप्ति के अधिकार को भारतीय संविधान के दो मौलिक अधिकार अनु0 19 (1) तथा अनु0 21 नागरिकों को दो मौलिक अधिकार उपलब्ध कराते हैं। कुछ ऐसी सूचनायें हैं जिन्हें प्राप्त करने से रोक है। सूचना के अधिकार अधिनियम के अनु0 8 (1) के अनुसार - 1 जिस सूचना को सार्वजनिक करने से भारत की सम्प्रभुता, अखंडता, सुरक्षा, रणनीति सम्बन्धी हितों, वैज्ञानिक हितों, आर्थिक हितों या विदेशों के सम्बन्धों पर प्रतिकूल असर पड़ता हो या किसी अपराध को करने को उकसावा मिलता हो। 2 जिस सूचना को प्रकट करने पर अदालत ने रोक लगा रखी हो या जिसे सार्वजनिक करने से अदालत की अवमानना होती हो। 3 सूचना जिससे किसी तीसरे पक्ष की स्पर्धात्मक क्षति हो, यदि सक्षम अधिकारी संतुष्ट नहीं है कि सूचना देना व्यापक जनहित में है। 4 वह सूचना जिससे किसी व्यक्ति का जीवन या सुरक्षा खतरे में पड़े या उस स्रोत की जानकारी मिले जिसने कानून व्यवस्था या सुरक्षा के लिये गोपनीयता से जानकारी या सहायता दी है। 5 सूचना जिससे अपराधी की जाँच, धरपकड़ या उसे सजा देने पर विपरीत प्रभाव पड़े। 6 मंत्रिमण्डल के ऐसे कागज-पत्र, जिनपर मंत्रियों, सचिवों और अन्य अधिकारियों के विचार-विमर्श की टिप्पणियों का रिकार्ड शामिल है। 7 जिस सूचना को सार्वजनिक करना न तो लोक हित के लिये जरूरी है और न जिससे सार्वजनिक मकसदपूरा होता है और जिससे किसी व्यक्ति के निजी जीवन और एकान्त के अधिकार पर प्रतिकूल असर पड़ता है। 8 ऐसी सूचना जिसका सार्वजनिक किया जाना भले ही लोक हित में हो मगर जिसे जाहिर करने से संरक्षितों को ज्यादा नुकसान होता हो। इन सबके बावजूद सार्वजनिक प्राधिकरण सूचना प्रदान करा सकता है यदि वह संतुष्ट है कि सूचना प्रदान करने से होने वाला जनहित उससे होने वाली क्षति से अधिक है।(अनु08(2)समस्यायें -सवाल यह है कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के लागू हो जाने के पष्चात इसके क्रियान्वयन में आ रही अड़चनों का सामना किस प्रकार किया जाय। प्रष्न का विषय है, यदि आप सूचना हासिल करके सम्बद्ध अधिकारियों को प्रस्तुत कर दें इसके बाद भी वह निष्क्रियता से पेष आये तो आम नागरिक क्या कर सकता है? इसके लिये सम्बन्धित अधिकारियों को जनता के प्रति उत्तरदायी होना पड़ेगा। जब जनता सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत दस्तावेज हासिल करके पारदर्शिता की माँग करती है तो कार्यवाही करने से सम्बन्धित अधिकारी इंकार कर देते हैं। प्रथम दृष्ट्या किसी भी प्रकार से आप सूचना प्राप्त कर लें और आप के साथ इस प्रकार का व्यवहार हो यह कहाँ तक उचित है? क्योंकि जनता को सूचना प्राप्त करने से पूर्व अत्यन्त तीव्र विरोध का सामना नौकरशाहों से करना पड़ता है। कुछ अधिकारियों का मानना है कि किसी फाइल नोटिंग को उजागर करने का प्रावधान अपने विचार व्यक्त करने में बाधक होगा, यह कहाँ तक उचित है? इस अधिनियम के लागू हो जाने के बाद अभी तक राज्य सरकारों ने अपनी प्रतिबद्धता और उत्साह का परिचय नहीं दिया है। सूचना के अधिकार की जानकारी केवल प्रबुद्ध वर्ग तक सीमित रह गयी है। बी0पी0एल0 श्रेणी के लोगों को ऐसी व्यवस्था दी गयी है कि वह निःषुल्क सूचना पाने के हकदार हैं पर क्या उनमें इस अधिकार के प्रति जागरुकता है? वे नौकरषाही से बच कर रहना जानते हैं क्योंकि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की गड़बड़ियों का षिकार होना शायद उनकी नियति है, ऐसा वह मानते हैं। यह आवश्यक नहीं कि मागे जाने पर स्पष्ट सूचना प्राप्त ही हो क्योंकि सरकारी कार्य व्यापार की जानकारी इन्हें भलीभाँति नहीं होती जिसका कारण इस अधिकार के उपयोग में समझ की कमी है।सूचना के अधिकार का कानून लागू हो जाने के पश्चात इसकी प्रथम चुनौती शासन-प्रषासन में जनता तक सूचना को सुचारु रूप से उपलब्ध कराने की है जिसमें आला अधिकारियो से लेकर निचले कर्मचारी भी अपनी भूमिका पहचान सकें। इसके अन्य अवरोधों में राजनीतिक स्तरों पर उदासीनता और इन अधिकारों के प्रति जड़ता है। यह सच है कि केवल शीर्ष विधायक से सांसद के स्तर पर पक्ष एवं प्रतिपक्ष के जनप्रतिनिधियों द्वारा सूचना के अधिकार की लड़ाई को आत्मसात नहीं किया जायेगा तब तक इसे सफलतापूर्वक लागू करना असंभव है।नागरिक किसी कार्यालय में जाकर कोई जानकारी या सरकारी दस्तावेज की माँग करे तो उसे औपचारिकत पूरी करने के बाद भी आसानी से सूचना प्राप्त नहीं होती, यह सच है। इन्हें उपेक्षित होना पड़ता है। जब तक जानकारी प्रदान करने की समुचित प्रणाली का विकास नहीं किया जायेगा तब तक यह प्रावधान मूर्त रूप में नहीं हो सकेगा। आज लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार में यह सबसे बड़ी खामी है कि उसने लोकतंत्र मंे लोक की सहभागिता को उचित स्थान नहीं दिया है। जिसका परिणाम है कि आम आदमी में सरकारी कार्यों के प्रति उदासीनता रहती है। तात्पर्य यह है कि सूचना का अधिकार जनता का अधिकार है और जबतक अपने इस अधिकार का प्रयोग जनता बखूबी नहीं करेगी तबतक इसकी सार्थकता सिद्ध न हो सकेगी।समाधान -सूचना के अधिकार के समुचित प्रयोग से ही शासन एवं निजी क्षेत्रों में से सूचना प्राप्त कर हो रही खामियों को उजागर कर उन्हें दूर किया जा सकेगा। इसके लिये कुछ आवष्यक सुझाव इस प्रकार से हैं -1। जनता के जीवन एवं उनके विकास कार्यक्रम की सूचना हर संभव प्रयास करके प्रसारित की जाय।2. ऐसा अभियान चलाया जाय जिससे कि हर विभाग के अधिकारी सूचना प्रदान करने में कोताही न करें।3. सूचना प्राप्त करने के लिये किसी कठिन प्रक्रिया का सामना न करना पड़े और आसानी से सूचना प्राप्त हो सके।4. सूचना समय से उपलब्ध न कराने वाले अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्यवाही की जाय जिससे कि अन्य अधिकारियों को सबक मिल सके।5. ई-शासन का सपना साकार हो जिसके लिये सूचना तकनीक से मुफीद और कोई रास्ता नहीं हो सकता क्योंकि इसके इस्तेमाल से ही शासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही को स्थान मिल सकेगा। ऐसा तभी संभव है जब शासन की सभी जानकारी जो लोकहित में हो, इण्टरनेट पर उपलब्ध हो।6. इसे और असरदार बनाने के लिये यह आवष्यक है कि हर स्तर पर इसकी अनिवार्यता को स्थान मिले जिससे कि जनता को आसानी से सहभागी शासन में भूमिका प्राप्त हो सके।7. सरकार में जनसहभागिता को स्थान प्राप्त हो।8.शासन-तंत्र अपने कायों के प्रति पारदर्शी हो।9. सूचना के अधिकार से प्रशासन में हो रहे भ्रष्टाचार को खत्म किया जा सकता है। क्योंकि गोपनीयता और भ्रष्टाचार में बड़ा ही ताल-मेल होता है, जिसका नाम मिटाना अत्यन्त आवष्यक है।10. जनता मेम जानकारी माँगने और उसके प्रयोग करने का स्वभाव विकसित करना होगा।11. जब तक सूचना पाने के अभियान पर बल नहीं दिया जायेगा तब तक इसका समुचित लाभ न मिल सकेगा।स्पष्ट है कि सूचना के अधिकार को अभी अनेक पड़ाव से होकर गुजरना है। जबतक इसके सिद्धान्त और व्यवहार में समन्वय नहीं देखने को मिलेगा तब तक इसकी यथोचित सार्थकता सिद्ध नहीं हो सकेगी।

केंद्र-राज्य संबंध

केंद्र-राज्य संबंध से अभिप्राय है कि किसी लोकतांत्रिक राष्ट्रीय-राज्य में संघवादी केंद्र और उसकी इकाइयों के बीच के आपसी संबंध। दुनियाभर में लोकतंत्र के उदय के साथ राजनीति में केंद्र-राज्य संबंधों को एक नई परिभाषा मिली। भारत में आजादी के बाद से केंद्र-राज्य संबंध का मसला अत्याधिक संवेदनशील मामला रहा है। मुद्दा चाहे अलग भाषाई पहचान,आसमान विकास, राज्यों के गठन का हो, पु़नर्गठन का हो या फिर विशेष राज्य का दर्जा देने से जुड़ा हो। ये सब केंद्र-राज्य संबंधों की सीमा में आते हैं। यही नहीं देश में शिक्षा, व्यापार जैसे विषयों पर नीति निर्माण का सवाल हो उसमें जो बात फोकस में रहती है वह है केंद्र और राज्य के बीच में इनको लेकर क्या आपसी समझ है।  भारतीय संविधान में भारत को राज्यों का संघ कहा गया है न कि संघवादी राज्य। भारतीय संविधान में विधायी, प्रशासिनिक और वित्तीय शक्तियों का सुस्पष्ट बंटवारा केंद्र और राज्यों के बीच किया है। विधायी शक्ति के विषयों को तीन सूचियों में बांटा गया है। इसमें पहली सूची है केंद्रीय सूची, दूसरी है राज्य सूची और तीसरी सूची है समवर्त्ती सूची। कें द्रीय सूची में वे विषय शामिल किए गए हैं जिन पर सिर्फ केंद्र सरकार कानून बना सकती है। इस सूची में राष्ट्रीय महत्व के विषय शामिल किए गए है जैसे कि प्रतिरक्षा, विदेश संबंध, मुद्रा, संचार और वित्तीय मामले आदि। राज्य सूची में कानून और व्यवस्था, जन स्वास्थ्य, प्रशासन जैसे स्थानीय महत्व के विषयों को शामिल किया गया है। समवर्त्ती सूची में उन विषयों को शामिल किया गया है जिनपर केंद्र ओर राज्य दोनों ही कानून बना सकते हैं। कोई राज्य सरकार केंद्र के द्वारा बनाए गए कानूनों व नीति के विरोध में या फिर विपरीत कानून नहीं बना सकती है। संविधान के अनुछेद 256व 355 में केंद्र को शक्तिशाली बनाया गया है।

प्रस्तावित बुंदेलखंड राज्य


बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी द्वारा प्रस्तावित बुंदेलखंड राज्य में कुछ जिले उत्तर प्रदेश के तथा कुछ मध्य प्रदेश के हैं,वर्तमान में बुंदेलखंड क्षेत्र की स्तिथि बहुत ही गंभीर है । यह क्षेत्र पर्याप्त आर्थिक संसाधनों से परिपूर्ण है किन्तु फिर भी यह अत्यंत पिछड़ा है । इसका मुख्य कारण है,राजनीतिक उदासीनता। न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकारें इस क्षेत्र के विकास के लिए गंभीर हैं । इसलिए इस क्षेत्र के लोग अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग लम्बे समय से करते आ रहे है.प्रस्तावित बुंदेलखंड राज्य में उ.प्र. के महोबा, झाँसी, बांदा, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर और चित्रकूट जिले शामिल हैं, जबकि म.प्र. के छतरपुर, सागर, पन्ना, टीकमगढ़, दमोह, दतिया, भिंड, सतना आदि जिले शामिल हैं। बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक संजय पाण्डेय का कहना है कि यदि बुंदेलखंड राज्य का गठन हुआ तो यह देश का सबसे विकसित प्रदेश होगा। प्रस्तावित बुंदेलखंड राज्य की आबादी चार करोड़ से भी अधिक होगी। जनसँख्या के हिसाब से यह देश का नौंवा सबसे बड़ा राज्य होगा ।

यूं तो बुंदेलखण्ड क्षेत्र दो राज्यों में विभाजित है-उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश, लेकिन भू-सांस्कृतिक दृष्टि से यह क्षेत्र एक दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। रीति रिवाजों, भाषा और विवाह संबंधों ने इस एकता को और भी पक्की नींव पर खड़ा कर दिया।

samthar fort समथर


सत्रहवीं सताब्दी में बुंदेलखंड अत्यंत छोटे छोटे राज्यों में विभक्त था। दतिया के भगवान राय के काल  में (संवत १६२६-१६५६) समथर राज्य अस्तित्व में आया। दतिया के महाराजा इन्द्रजीत सिंह के शासन काल में समथर राजधर की उपाधि से गुर्जर राज्य की स्थापना हुयी। मर्दन सिंह को समथर की किलेदारी सौपी गयी और समथर स्टेट धीरे धीरे दतिया के अधीन सुद्रढ़ राज्य के रूप में स्थापित हो गया। कई शासकों ने इस राज्य की प्रगति में योगदान दिया। झाँसी गजेटियर के अनुसार, जो इस बात की पुष्टि भी करता है कि समथर के स्वतंत्र राज्य की नीव चंद्रभान वीर गुर्जर और उनके पोते मदन सिंह, दतिया के राजा के द्वारा डाली गई थी।  महाराजाओं के क्रम निम्नवत हैः

 1-   श्री नौने शाह                                            (1735-1740)
 2-   श्री मदन सिंह जूदेव                                  (1740-1745)
 3-   श्री राजधर विश्हना  सिंह                              (1745-1790)
 4-   श्री राजा देवी सिंह जूदेव                            (1791-1800)
 5-   श्री राजा रणजीत सिंह (प्रथम)                   (1800-1815)
 6-   श्री राजा रणजीत सिंह (द्वितीय)                 (1815-1827)
 7-   श्री महाराजा हिन्दू पति जूदेव                    (1827-1858)
 8-   श्री महाराजा चतुर सिंह जूदेव                   (1865-1896)
 9-   श्री महाराजा वीर सिंह जूदेव                     (1896-1935)
10-   श्री महाराजा राधाचरण सिंह जूदेव             (1935-1947)
11-  श्री महाराजा रणजीत सिंह जूदेव (तृतीय )  (1947- अद्यतन 

 ''सम्प्रति महाराजा रणजीत सिंह जूदेव जी भारतीय राजनीति में प्रमुख स्थान रखते हैं और आप भारत  सरकार के गृह राज्य मंत्री सहित विभिन्न सम्मानित राजनीतिक  पदों को सुशोभित कर चुके हैं, कर रहे हैं ।''

विशेष :-     1858 से 1865 के मध्य में समथर राज्य के युवराज शीघ्र ..........

इतिहास - झाँसी क्रांति के समय में समथर राज्य अंग्रेजों के अधीन था। झाँसी क्रांति के पूर्व से ही समथर राज्य मराठों की उदीयमान शक्ति का सहयोगी रहा है, चूकि झाँसी राज्य मराठों के सम्बंधित था। इसलिए समथर राज्य किसी प्रकार से  झाँसी की महारानी का विरोध नहीं करना चाहता था। समथर राज्य के महाराजा भी कट्टर भारतीयता से ओत प्रोत थे, और उन्होंने मराठों का साथ पकड़ा, किसी मुगल बादशाह का नहीं। जबकि बांदा, अवध आदि के नवाबों ने मुगलों का साथ दिया था। १८५७ की क्रांति के समय समथर में महाराजा महाहिंदुपति का शासन था, जो अवयस्क थे और शासन का भार राजमाता पर था। कुशल दीवान घाटमपुर वाले उनके सहयोगी थे, महारानी लक्ष्मीबाई झाँसी से कालपी के लिए समथर राज्य से होकर गुजरी थी तथा समथर राज्य के दतावली गाव में रुकी थीं। इस प्रकार समथर महान गुर्जर योद्धाओं के अधीन एक रियासत थी। पूर्व में स्थित समथर, समथर गढ़ के रूप में जाना जाता था। 
        समथर एक कस्बा है और उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में एक नगर पालिका है। भारत की जनगणना 2001 में समथर की आबादी 20,227 थी। पुरुषों और महिलाओं की जनसंख्या 47% से 53% . समथर की साक्षरता दर औसत 55% है, 59.5% की राष्ट्रीय औसत से कम है। पुरुष साक्षरता 66% है, और महिला साक्षरता 43% है। 
यहाँ सभी धर्म के लोग मिल जुलकर परस्पर सद्भाव से सभी त्यौहार मानते है। यहाँ मंदिरों, मस्जिदों की संख्या काफी ज्यादा है। राजमंदिर सुखदैनी माता का मंदिर, चित्रगुप्त मंदिर, स्यामदास जी का मंदिर, धनुषधारी का मंदिर ,अग्गा के हनुमान जी , तथा लंका पलंग हनुमान मंदिर आदि है।  नगर में रामनवमी और होली पर प्रति वर्ष दो कवि सम्मलेन होते है।
किलाः यहाँ अत्यंत विशाल किला है। 

राज महल-यह महल किले में है जो अभी आम लोगो के लिए खुला नहीं है। इसमें  तत्कालीन महाराजा साहब का निवास है । 

आवागमनः  झांसी से तकरीबन ७० किलोमीटर दूर है और दिल्ली से यहां भोपाल शताब्दी के जरिए आसानी से पहुंचा जा सकता है। अगर आप कार खुद ड्राइव कर रहे हैं, तो रास्ता पूछकर चलना ही बेहतर रहेगा।

वायु मार्गः नजदीकी हवाई अड्डा खजुराहो है जो 163 किमी. की दूरी पर है। यह एयरपोर्ट दिल्ली, वाराणसी और आगरा से नियमित फ्लाइटों से जुड़ा है।

रेल मार्ग- झांसी नजदीकी रेल मुख्यालय है। दिल्ली, आगरा, भोपाल, मुम्बई, ग्वालियर आदि प्रमुख शहरों से झांसी के लिए अनेक रेलगाडियां हैं। वैसे मोठ तक भी रेलवे लाइन है जहां पैसेन्जर आदि ट्रेनों से पहुंचा जा सकता है।

सड़क मार्ग- समथर झांसी-कानपूर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-25 पर स्थित है। नियमित बस सेवाएं मोठ को  झांसी और कानपूर से को जोड़ती हैं। मोठ से समथर 14 किलोमीटर है। झाँसी के लिए दिल्ली, आगरा, भोपाल, ग्वालियर और वाराणसी से नियमित बसें चलती हैं।

सन्दर्भ -लेख वीर वाणी २००९-२०१० राजकीय इंटर कालेज समथर पत्रिका, उदिता 1997-2009 राजकीय डिग्री कालेज समथर पत्रिका, झाँसी गजेटियर और जनश्रुति पर आधारित है ।



कानपुर

गंगा नदी के किनारे बसा कानपुर उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा और उत्तर भारत के प्रमुख औद्योगिक शहरों में एक है। साथ ही यह शहर धार्मिक, ऐतिहासिक और व्यवसायिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है। माना जाता है कि इस शहर की स्थापना सचेन्दी राज्य के राजा हिन्दू सिंह ने की थी। कानपुर का मूल नाम कान्हपुर था। अठारहवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक इस शहर का विशेष महत्व नहीं था। 1765 में जब अवध के नवाब शुजाउद्दौला को अंग्रेजों ने जाजमऊ के निकट परास्त किया तो इस शहर का महत्व काफी बढ़ गया। 260 वर्ग किमी. में फैला यह शहर उत्तर प्रदेश की राजधानी है।  प्रदेश की राजधानी लख्ननऊ से ८० किलोमीटर पश्चिम स्थित यहाँ नगर प्रदेश की औद्योगिक राजधानी के नाम से भी जाना जाता है। ऐतिहासिक और पौराणिक मान्यताओं के लिए चर्चित ब्रह्मावर्त (बिठूर) के उत्तर मध्य में स्थित ध्रुवटीला त्याग और तपस्या का संदेश दे रहा है।

दंतकथा

                         मान्यता है इसी स्थान पर ध्रुव ने जन्म लेकर परमात्मा की प्राप्ति के लिए बाल्यकाल में कठोर तप किया और ध्रुवतारा बनकर अमरत्व की प्राप्ति की। रखरखाव के अभाव में टीले का काफी हिस्सा गंगा में समाहित हो चुका है लेकिन टीले पर बने दत्त मंदिर में रखी तपस्या में लीन ध्रुव की प्रतिमा अस्तित्व खो चुके प्राचीन मंदिर की याद दिलाती रहती है। बताते हैं गंगा तट पर स्थित ध्रुवटीला किसी समय लगभग १९ बीघा क्षेत्रफल में फैलाव लिये था। इसी टीले से गंगा टकरा कर गंगा का प्रवाह थोड़ा रुख बदलता है। पानी लगातार टकराने से टीले का लगभग १२ बीघा हिस्सा कट कर गंगा में समाहित हो गया। टीले के बीच में बना ध्रुव मंदिर भी कटान के साथ गंगा की भेंट चढ़ गया। बुजुर्ग बताते हैं मंदिर की प्रतिमा को टीले के किनारे बने दत्त मंदिर में स्थापित कर दिया गया। पेशवा काल में इसकी देखरेख की जिम्मेदारी राजाराम पंत मोघे को सौंपी गई। तब से यही परिवार दत्त मंदिर में पूजा अर्चना का काम कर रहा है। मान्यता है ध्रुव के दर्शन पूजन करने से त्याग की भावना बलवती होती है और जीवन में लाख कठिनाइयों के बावजूद काम को अंजाम देने की प्रेरणा प्राप्त होती है।
 कानपुर के दर्शनीय स्थल

 कानपुर के दर्शनीय स्थल

नानाराव पार्क (कम्पनी बाग), चिड़ियाघर, राधा-कृष्ण मन्दिर, सनाधर्म मन्दिर, काँच का मन्दिर, श्री हनुमान मन्दिर पनकी, सिद्धनाथ मन्दिर, जाजमऊ आनन्देश्वर मन्दिर परमट, जागेश्वर मन्दिर चिड़ियाघर के पास, सिद्धेश्वर मन्दिर चौबेपुर के पास, बिठूर साँई मन्दिर, मन्धना तकनीकी एवं शैक्षिक संस्थान, ब्लू वर्ड, श्री छत्रपति साहूजी महाराज विश्वविद्यालय (पूर्व में कानपुर विश्वविद्यालय), भारतीय तकनीकी संस्थान (आई.आई.टी.), हरकोर्ट बटलर तकनीकी संस्थान(एच.बी.टी.आई.), चन्द्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय कानपुर, गंगा बैराज इत्यादि।

जाजमऊ

जाजमऊ को प्राचीन काल में सिद्धपुरी नाम से जाना जाता था। यह स्थान पौराणिक काल के राजा ययाति के अधीन था। वर्तमान में यहां सिद्धनाथ और सिद्ध देवी का मंदिर है। साथ ही जाजमऊ लोकप्रिय सूफी संत मखदूम शाह अलाउल हक के मकबरे के लिए भी प्रसिद्ध है। इस मकबरे को 1358 ई. में फिरोज शाह तुगलक ने बनवाया था। 1679 में कुलीच खान की द्वारा बनवाई गई मस्जिद भी यहां का मुख्य आकर्षण है। 1957 से 58 के बीच यहां खुदाई की गई थी जिसमें अनेक प्राचीन वस्तुएं प्राप्त हुई थी।

श्री राधाकृष्ण मंदिर जेके मंदिर

यह मंदिर जे. के. मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। बेहद खूबसूरती से बना यह मंदिर जे. के. ट्रस्ट द्वारा बनवाया गया था। प्राचीन और आधुनिक शैली से निर्मित यह मंदिर कानपुर आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र रहता है। यह मंदिर मूल रूप से श्रीराधाकृष्ण को समर्पित है। इसके अलावा श्री लक्ष्मीनारायण, श्री अर्धनारीश्वर, नर्मदेश्वर और श्री हनुमान को भी यह मंदिर समर्पित है।

 जैन ग्लास मंदिर

वर्तमान में यह मंदिर पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन गया है। यह खूबसूरत नक्कासीदार मंदिर कमला टॉवर के विपरीत महेश्वरी मोहाल में स्थित है। मंदिर में ताम्रचीनी और कांच की सुंदर सजावट की गई है।

 कमला रिट्रीट

कमला रिट्रीट एग्रीकल्चर कॉलेज के पश्चिम में स्थित है। इस खूबसूरत संपदा पर सिंहानिया परिवार का अधिकार है। यहां एक स्वीमिंग पूल बना हुआ है, जहां कृत्रिम लहरें उत्पन्न की जाती है। यहां एक पार्क और नहर है। जहां चिड़ियाघर के समानांतर बोटिंग की सुविधा है। कमला रिट्रीट में एक संग्रहालय भी बना हुआ है जिसमें बहुत सी ऐतिहासिक और पुरातात्विक वस्तुओं का संग्रह देखा जा सकता है। यहां जाने के लिए डिप्टी जनरल मैनेजर की अनुमति लेना अनिवार्य है।

 फूल बाग

फूल बाग को गणेश उद्यान के नाम से भी जाना जाता है। इस उद्यान के मध्य में गणेश शंकर विद्यार्थी का एक मैमोरियल बना हुआ है। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद यहां ऑथरेपेडिक रिहेबिलिटेशन हॉस्पिटल बनाया गया था। यह पार्क शहर के बीचों बीच मॉल रोड पर बना है।

 एलेन फोरस्ट जू

1971 में खुला यह चिड़ियाघर देश के सर्वोत्तम चिड़ियाघरों में एक है। कुछ समय पिकनिट के तौर पर बिताने और जीव-जंतुओं को देखने के लिए यह चिड़ियाघर एक बेहतरीन जगह है।

कानपुर मैमोरियल चर्च

1875 में बना यह चर्च लोम्बार्डिक गोथिक शैली में बना हुआ है। यह चर्च उन अंग्रेजों को समर्पित है जिनकी 1857 के विद्रोह में मृत्यु हो गई थी। ईस्ट बंगाल रेलवे के वास्तुकार वाल्टर ग्रेनविले ने इस चर्च का डिजाइन तैयार किया था।
 नाना राव पार्क

नाना राव पार्क फूल बाग से पश्चिम में स्थित है। 1857 में इस पार्क में बीबीघर था। आजादी के बाद पार्क का नाम बदलकर नाना राव पार्क रख दिया गया।

स्रोत- यात्रा सलाह . कॉम ,विकिपीडिया ,जागरण ,अमरउजाला और मेरी समझ 

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